हज के महीनों में उमरा किए बिना केवल हज करने को हज-ए-इफ़राद कहा जाता है। इस स्थिति में मीक़ात से केवल हज की नीयत से एहराम बाँधना होता है। मक्का पहुँचकर तवाफ़-ए-क़ुदूम (आगमन तवाफ़) करना होता है। इच्छा हो तो इस तवाफ़ के बाद सई भी की जा सकती है। ऐसी स्थिति में हज के फ़र्ज़ तवाफ़ के बाद दोबारा सई नहीं करनी होगी। तवाफ़-ए-क़ुदूम के बाद एहराम की अवस्था में मक्का में ठहरना होता है। 8 ज़िलहज्ज को उसी एहराम में हज के कार्य पूरे करने के उद्देश्य से मिना की ओर रवाना होना होता है। हज-ए-इफ़राद करने वाले को हदी ज़बह नहीं करनी होती। इसलिए 10 ज़िलहज्ज को कंकरी मारने के बाद सिर मुंडवाकर हज-ए-इफ़राद करने वाला प्रारंभिक रूप से हलाल हो सकता है।
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अध्याय 5 / 12
हज के प्रकार
इफ़राद हज
1 मिनट में पढ़ेंआखिरी अपडेट 1 सितंबर 2026