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बदली हज्ज

5 मिनट में पढ़ेंआखिरी अपडेट 1 सितंबर 2026

यदि कोई व्यक्ति फ़र्ज़ हज अदा करने में असमर्थ हो, तो उसकी ओर से ज़िम्मेदारी लेकर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा हज अदा करने को बदली हज कहते हैं। कई हदीसों से बदली हज का विधान मिलता है। नीचे वे हदीसें उल्लेखित हैं।

१. ख़सअम क़बीले की एक महिला ने रसूलुल्लाह (ﷺ) से कहा, ‘या रसूलुल्लाह (ﷺ), अल्लाह ने अपने बंदों पर जो फ़र्ज़ अनिवार्य किया है, वह मेरे पिता पर अत्यंत वृद्धावस्था में लागू हुआ है। वह सवारी पर स्थिर होकर बैठ नहीं सकते। तो क्या मैं उनकी ओर से हज अदा कर दूँ?’ आपने कहा, ‘हाँ।’ यह घटना विदाई हज के समय की थी।[1]

२. अबू रज़ीन अल-अक़ीली से वर्णित है। उन्होंने आकर रसूलुल्लाह (ﷺ) से पूछा, ‘मेरे पिता बहुत वृद्ध हैं। वह हज और उमरा अदा नहीं कर सकते और न ही सवारी पर चढ़कर यात्रा कर सकते हैं।’ रसूलुल्लाह (ﷺ) ने कहा, ‘अपने पिता की ओर से हज और उमरा करो।’[2]

३. रसूलुल्लाह (ﷺ) ने एक व्यक्ति को कहते हुए सुना, لَبَّيْكَ عَنْ شُبْرَمَةَ—शुबरमा की ओर से लब्बैक। आपने पूछा, ‘शुबरमा कौन है?’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘मेरा भाई या रिश्तेदार।’ आपने पूछा, ‘क्या तुमने अपना हज कर लिया है?’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘नहीं।’ आपने कहा, ‘पहले अपना हज करो, फिर शुबरमा का हज।’[3]

हज के तीन प्रकारों में से बदली हज किस प्रकार का होगा, यह वह व्यक्ति निर्धारित करेगा जिसकी ओर से हज किया जा रहा है (المحجوج عنه)। यदि वह इफ़राद करने को कहे तो इफ़राद करना होगा, यदि क़िरान करने को कहे तो क़िरान करना होगा और यदि तमत्तु करने को कहे तो तमत्तु करना होगा। इसके विपरीत करने पर वह मान्य नहीं होगा। ऐसी कोई बात नहीं है कि बदली हज अनिवार्य रूप से इफ़राद हज ही होना चाहिए। बल्कि ऊपर उल्लिखित दूसरी हदीस में हज और उमरा दोनों का उल्लेख है। इसमें इस ओर संकेत है कि बदली हज करने वाला तमत्तु हज कर सकता है।

यदि बदली हज करने वाला इफ़राद के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकार का हज करे तो उसका हज नहीं होगा—हदीस में ऐसी कोई बाध्यता नहीं मिलती। ‘हज’ शब्द का उच्चारण करने से केवल इफ़राद ही अभिप्रेत होगा, इसके पक्ष में भी कोई ठोस प्रमाण नहीं है। क्योंकि एक हदीस में आया है कि उमरा हज के साथ अभिन्न रूप से जुड़ गया है। دَخَلَتِ اْلُعمْرَةُ ِفْي اْلحَجِّ (उमरा हज में दाख़िल हो गया है)[4] इसलिए रसूलुल्लाह (ﷺ) ने ख़सअम क़बीले की महिला को उसके पिता की ओर से बदली हज करने की अनुमति देते समय जब कहा, فَحُجِّيْ عَنْهُ ‘अपने पिता की ओर से हज करो’, तो इससे आपने उमरे के बिना हज अभिप्रेत लिया था—इस बात के पीछे बिल्कुल भी कोई तर्क नहीं है।

बदली हज केवल इफ़राद हज ही होना चाहिए—फ़िक़्ह की किसी विश्वसनीय किताब में भी यह बात नहीं लिखी है। फ़िक़्ह की किताबों में जो लिखा है, वह यह है कि जिसकी ओर से बदली हज किया जा रहा है, वह जिस प्रकार का निर्देश दे, उसी प्रकार का हज करना होगा। यहाँ मैं प्रसिद्ध किताब बदाएउस-सनाए (بدائع الصنائع) की कुछ इबारतें उद्धृत कर रहा हूँ—

إذا أمر بحجة مفردة أو بعمرة مفردة، فقرن فهو مخالف ضامن في قول أبي حنيفة، وقال أبو يوسف ومحمد يجزي ذلك عن الآمر، نستحسن وندع القياس فيه --- ولو أمره أن يحج عنه، فاعتمر ضمن، لأنه خالف، ولو اعتمر، ثم حج من مكة، يضمن النفقة في قولهم جميعا، لأمره له بالحج بسفر، وقد أتى بالحج من غير سفر، لأنه صرف سفره الأول إلى العمرة، فكان مخالفا، فيضمن النفقة —

ولو أمره بالحج عنه بجمع بين إحرام الحج والعمرة، فأحرم بالحج عنه وأحرم بالعمرة عن نفسه، فحج عنه ،واعتمر عن نفسه، صار مخالفا في ظاهر الرواية عن أبي حنيفة.

अर्थात, (जो बदली हज करवा रहा है) यदि वह केवल हज करने का निर्देश दे अथवा केवल उमरा करने का निर्देश दे और बदली हज करने वाला क़िरान हज करे, तो इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) के मतानुसार बदली हज करने वाले को क्षतिपूर्ति देनी होगी। इमाम अबू यूसुफ़ और इमाम मुहम्मद (र.) के निकट वह निर्देश देने वाले की ओर से अदा हो जाएगा। बल्कि हम इसे इस्तिहसान मानते हैं और इस मामले में क़ियास को छोड़ देते हैं। जो व्यक्ति बदली हज करवा रहा है, यदि वह हज करने का निर्देश दे और बदली हज करने वाला उमरा करे, तो उसे क्षतिपूर्ति देनी होगी। क्योंकि उसने निर्देश के अनुसार कार्य नहीं किया। और यदि वह उमरा करे तथा बाद में मक्का से हज करे, तो सभी के मतानुसार उसे क्षतिपूर्ति देनी होगी। क्योंकि बदली हज करवाने वाले ने बदली हज करने वाले को यह निर्देश दिया था कि वह यात्रा हज के लिए करे, जबकि उसने यात्रा किए बिना ही हज किया। क्योंकि उसने पहली यात्रा उमरे के लिए इस्तेमाल कर ली थी। इस प्रकार उसने निर्देश के विपरीत कार्य किया, इसीलिए उसे क्षतिपूर्ति देनी होगी। यदि निर्देश देने वाला हज और उमरा दोनों को एक ही इहराम में एकत्र करके अदा करने को कहे और बदली हज करने वाला निर्देश देने वाले की ओर से केवल हज करे, लेकिन उमरा अपनी ओर से करे, तो इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) से वर्णित एक ज़ाहिर रिवायत के अनुसार उसने निर्देश के विपरीत कार्य किया।[5]

उपरोक्त उद्धरण से यह स्पष्ट है कि बदली हज करवाने वाले के कथन के अनुसार हज अदा करना होगा। वह जिस प्रकार का निर्देश दे, उसी प्रकार का हज करना होगा। निर्देश के अनुसार हज न करने पर किन-किन स्थितियों में क्षतिपूर्ति देनी होगी, इस विषय में मतभेद है। बदली हज करने वाले को हर स्थिति में इफ़राद हज ही करना होगा—यह बात न इमाम अबू हनीफ़ा, न इमाम मुहम्मद और न ही इमाम अबू यूसुफ़ ने कही है।

[1] - يارسول الله إن فريضة الله على عباده ، أدركت أبي شيخا كبيرا لا يثبت على الراحلة ، أفأحج عنه ؟ قال: نعم ، وذلك في حجة الوداع (बुख़ारी : हदीस नं. १४१७)

[2] قال يا رسول الله إن أبي شيخ كبير لا يستطيع الحج والعمرة والظعن فقال حج عن أبيك واعتمر (तिर्मिज़ी : हदीस नं. ८५२)

[3] - عن ابن عباس أن رسول الله سمع رجلا يقول لبيك عن شبرمة فقال من شبرمة؟ قال أخي أو قريب لي. قال :هل حججت؟ قال لا قال حج عن نفسك ثم حج عن شبرمة (अबू दाऊद : हदीस नं. १४२४)

[4] - मुस्लिम : हदीस नं. १२१८

[5] - बदाएउस-सनाए : खंड २, पृ. २१३-२१४