तमत्तु हज का पहला कार्य उमरा अदा करना है। इसलिए नीचे उमरा अदा करने की विधि का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।
उमरा का परिचय :
इहराम बाँधना, तवाफ करना, दो पहाड़ियों के बीच स्थित स्थान में दौड़ना और सिर के बाल मुँडवाना या छोटे करवाना—इन इबादतों के समूह का नाम उमरा है। इनका विस्तृत विवरण निम्नलिखित है :
प्रथम. इहराम :
मीकात पहुँचने के बाद उसी प्रकार गुस्ल करना सुन्नत है, जिस प्रकार फर्ज गुस्ल किया जाता है। जैसा कि ज़ैद इब्न साबित रज़ि. द्वारा वर्णित हदीस में उल्लेख हुआ है :
«أَنَّهُ رَأَى النَّبِىَّ صلى الله عليه وسلم تَجَرَّدَ لإِهْلاَلِهِ وَاغْتَسَلَ».
उन्होंने देखा कि ‘रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इहराम के लिए अलग हुए और गुस्ल किया।’[1]
इहराम से पहले यह गुस्ल पुरुषों और महिलाओं, सभी के लिए सुन्नत है; यहाँ तक कि हायज़ और निफास वाली महिला के लिए भी। क्योंकि विदाई हज के समय जब असमा बिन्त उमैस रज़ि. ने मुहम्मद इब्न अबू बक्र को जन्म दिया, तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे कहा,
«اغْتَسِلِى وَاسْتَثْفِرِى بِثَوْبٍ وَأَحْرِمِى».
‘तुम गुस्ल कर लो, कपड़े से रक्त रोक लो और इहराम बाँध लो।’[2]
इसके बाद अपने पास उपलब्ध सर्वोत्तम सुगंध सिर और दाढ़ी में लगाएँ। इहराम के बाद भी उसकी सुगंध शेष रहे तो इसमें कोई समस्या नहीं है। जैसा कि आयशा सिद्दीका रज़ि. द्वारा वर्णित हदीस से ज्ञात होता है। वह कहती हैं,
«كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا أَرَادَ أَنْ يُحْرِمَ يَتَطَيَّبُ بِأَطْيَبِ مَا يَجِدُ ثُمَّ أَرَى وَبِيصَ الدُّهْنِ فِى رَأْسِهِ وَلِحْيَتِهِ بَعْدَ ذَلِكَ».
‘रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इहराम की तैयारी के समय अपने पास उपलब्ध उत्तम सुगंध लगाया करते थे। इहराम के बाद भी मैं उनके बालों और दाढ़ी में उसके तेल की चमक देखती थी।’[3]
आवश्यकता महसूस हो तो इस समय बगल और नाभि के नीचे के बाल साफ कर लें तथा नाखून और मूँछें काट लें, ताकि इहराम के बाद इनकी आवश्यकता न पड़े—क्योंकि उस समय ये कार्य निषिद्ध होंगे। ये कार्य स्वयं प्रत्यक्ष रूप से सुन्नत नहीं हैं। इबादत की पूर्व-तैयारी के रूप में इन्हें करना चाहिए। यदि इहराम बाँधने से कुछ समय पहले ये कार्य कर लिए गए हों तो इहराम की अवस्था में इन्हें दोबारा करने की आवश्यकता नहीं होगी। इससे कई लोग इहराम से पहले सिर के बाल छोटे करवाने को भी सुन्नत समझते हैं। यह धारणा गलत है। और इस अवसर पर दाढ़ी काटने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। क्योंकि दाढ़ी काटना हमेशा हराम है। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया,
«خَالِفُوا الْمُشْرِكِينَ وَفِّرُوا اللِّحَى وَأَحْفُوا الشَّوَارِبَ».
‘तुम मुश्रिकों का विरोध करो। दाढ़ी बढ़ाओ और मूँछें छोटी करो।’[4]
गुस्ल, साफ-सफाई और सुगंध लगाने के ये सभी चरण पूरे करने के बाद इहराम के वस्त्र पहनें। संभव हो तो किसी नमाज़ के बाद इन्हें पहनें। यदि इस समय कोई फर्ज नमाज़ हो तो उसे अदा करके इहराम बाँधें, जैसा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने किया था। अन्यथा दो रकअत ‘तहिय्यतुल वुज़ू’ नमाज़ पढ़कर इहराम के वस्त्र पहनें।
यह जान लेना अच्छा है कि पुरुषों के इहराम का वस्त्र एक चादर और एक तहबंद है। हालाँकि दोनों कपड़ों का सफेद और साफ होना मुस्तहब है। इसके विपरीत महिलाएँ इहराम के वस्त्र के रूप में जो चाहें पहन सकती हैं। परंतु इस बात का ध्यान रखना होगा कि वस्त्र पुरुषों के वस्त्र जैसा न हो और उससे महिलाओं की सुंदरता भी प्रकट न हो। इसी प्रकार वे नकाब से चेहरा न ढकें और न ही दस्ताने पहनें। लेकिन गैर-महरम पुरुषों के सामने आने पर चेहरे पर कपड़ा लटका लें। इहराम की अवस्था में जूते भी पहन सकती हैं। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया,
«وَلْيُحْرِمْ أَحَدُكُمْ فِي إِزَارٍ وَرِدَاءٍ ، وَنَعْلَيْنِ ، فَإِنْ لَمْ يَجِدْ نَعْلَيْنِ فَلْيَلْبَسْ خُفَّيْنِ ، وَلْيَقْطَعْهُمَا حَتَّى يَكُونَا أَسْفَلَ مِنَ الْعَقِبَيْنِ».
‘तुममें से प्रत्येक व्यक्ति एक तहबंद, एक चादर और एक जोड़ी जूते पहनकर इहराम बाँधे। यदि जूते न हों तो मोज़े पहने और मोज़ों को थोड़ा काट ले, ताकि वे टखनों से नीचे हो जाएँ।’[5]
उपर्युक्त सभी कार्य पूरे हो जाने के बाद दिल से उमरा शुरू करने की नीयत करें। और कहें, لَبَّيْكَ عُمْرَةً (‘लब्बैका उमरतन’) अथवा لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ عُمْرَةً (‘लब्बैका अल्लाहुम्मा उमरतन’)। उत्तम यह है कि सवारी पर चढ़ने के बाद इहराम बाँधें और तलबिया पढ़ें। क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मीकात से रवाना होने के लिए सवारी पर बैठे और फिर जब वह चलने लगी तो उन्होंने तलबिया पढ़ना शुरू किया।
और जो व्यक्ति उमरा के उद्देश्य से इहराम बाँधे, यदि उसे किसी बीमारी या अन्य किसी ऐसी चीज़ की आशंका हो जो उसके उमरा के कार्य पूरे करने में बाधा बन सकती है, तो उमरा आरंभ करते समय इस प्रकार नीयत करे,
«اللَّهُمَّ مَحِلِّي حَيْثُ حَبَسْتَنِي».
(अल्लाहुम्मा महिल्ली हैसु हबस्तनी।)
‘ऐ अल्लाह, जहाँ आप मुझे रोक देंगे, वहीं मैं हलाल हो जाऊँगा।’[6] अथवा कहे,
«لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ لَبَّيْكَ ، وَمَحِلِّي مِنَ الأَرْضِ حَيْثُ تَحْبِسُنِي».
(लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक, व महिल्ली मिनल अरदि हैसु तहबिसुनी)
‘लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक। और जहाँ आप मुझे रोक देंगे, वहीं मैं हलाल हो जाऊँगा।’[7] क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दुबाआ बिन्त जुबैर रज़ि. को यही शिक्षा दी थी।
इन कार्यों को पूरा करने के बाद अधिकाधिक तलबिया पढ़ते रहें। क्योंकि तलबिया हज का मौखिक प्रतीक है। विशेष रूप से स्थान, समय और अवस्था बदलते समय अधिकाधिक तलबिया पढ़ें। जैसे : ऊँचे स्थान पर चढ़ते या नीचे उतरते समय, रात और दिन के बदलने के समय (सूर्योदय और सूर्यास्त के समय), कोई गलत या अनुचित कार्य हो जाने पर और नमाज़ के बाद आदि अवसरों पर। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस प्रकार तलबिया पढ़ते थे :[8]
«لَبَّيْكَ اللَّهُمَّ لَبَّيْكَ لَبَّيْكَ لاَ شَرِيكَ لَكَ لَبَّيْكَ إِنَّ الْحَمْدَ وَالنِّعْمَةَ لَكَ وَالْمُلْكَ لاَ شَرِيكَ لَك».
(लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक, लब्बैका ला शरीका लका लब्बैक, इन्नल हम्दा वन-निअमता लका वल-मुल्क, ला शरीका लक।) कभी-कभी इसमें थोड़ा और जोड़कर इस प्रकार भी पढ़ते थे :[9]
لَبَّيْكَ إِلَهَ الْحَقِّ ، لَبَّيْكَ.
(लब्बैक इलाहल हक्क लब्बैक)।
यदि इहराम पहनने वाला तलबिया में لَبَّيْكَ ذَا الْمَعَارِجِ (लब्बैका ज़ल मआरिज) जोड़ ले तो यह भी उत्तम है। विदाई हज में सहाबा तलबिया में विभिन्न शब्द जोड़ रहे थे। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वे शब्द सुनकर भी उनसे कुछ नहीं कहा।[10]
यदि तलबिया में इस प्रकार बढ़ाए :
لَبَّيْكَ لَبَّيْكَ وَسَعْدَيْكَ وَالْخَيْرُ بِيَدَيْكَ لَبَّيكَ وَالرَّغْبَاءُ إِلَيْكَ وَالْعَمَلُ.
(लब्बैक, लब्बैका व सअदैक वल-खैरा बियदैक, लब्बैका वर-रगबाउ इलैका वल-अमल)। तो इसमें भी कोई असुविधा नहीं है। क्योंकि उमर रज़ि. और उनके पुत्र अब्दुल्लाह रज़ि. से इस प्रकार के वाक्य जोड़ने का प्रमाण मिलता है।[11]
पुरुषों के लिए ऊँची आवाज़ में तलबिया कहना सुन्नत है। रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया,
«أَتَانِى جِبْرِيلُ فَأَمَرَنِى أَنْ آمُرَ أَصْحَابِى وَمَنْ مَعِى أَنْ يَرْفَعُوا أَصْوَاتَهُمْ .بِالإِهْلاَلِ - أَوْ قَالَ – بِالتَّلْبِيَةِ».
‘मेरे पास जिब्रील सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम आए। उन्होंने मुझे (ऊँची आवाज़ में तलबिया पढ़ने का) आदेश दिया और इस आशय के साथ मेरे सहाबा और साथियों को आदेश देने के लिए कहा कि वे इहलाल अथवा उन्होंने कहा, तलबिया ऊँची आवाज़ में पुकारें।’[12]
इसके अतिरिक्त ऊँची आवाज़ में तलबिया कहने से अल्लाह की निशानियों का प्रकटीकरण होता है, एकेश्वरवाद की तेजस्वी घोषणा होती है और शिर्क से मुक्त होने का इज़हार किया जाता है। इसके विपरीत सभी आलिमों की सर्वसम्मति से महिलाओं के लिए तलबिया, ज़िक्र और दुआ आदि मौखिक इबादतों में आवाज़ ऊँची न करना सुन्नत है। यही पर्दे की रक्षा और फितने को दबाने में सहायक है।
[1]. तिर्मिज़ी : ८३०; इब्न खुज़ैमा : २५९५; बैहकी : ८७२६।
[2]. पूर्वोक्त।
[3]. बुखारी : ५९२३; मुस्लिम : ११७०।
[4]. बुखारी : ५८९२; मुस्लिम : २९५।
[5]. मुस्नद अहमद : ९९८४; इब्न खुज़ैमा : १०६२।
[6]. बुखारी : ५०८९; मुस्लिम : १२०७।
[7]. नसाई : २७६६।
[8]. बुखारी : १५७४; मुस्लिम : १२१८।
[9]. इब्न माजाह : २९२०।
[10]. मुस्नद : १४४४०।
[11]. बुखारी : १५४९, मुस्लिम : ११८४।
[12]. अबू दाऊद : १८१४।