१. समुद्र या हवाई मार्ग से मीक़ात के समानांतर पहुँचने पर एहराम बाँधे बिना विमान के उतरने तक देर करना। यह नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के कथन के विपरीत है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,
«هُنَّ لَهُنَّ وَلِمَنْ أَتَى عَلَيْهِنَّ مِنْ غَيْرِهِنَّ مِمَّنْ أَرَادَ الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ.»
‘ये मीक़ातें इन क्षेत्रों के निवासियों और इन स्थानों पर आने वाले प्रत्येक बाहरी हज और उमरा करने वाले व्यक्ति के लिए एहराम बाँधने के स्थान हैं।’[1]
अतः विमान या जहाज़ से आने वाले व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह मीक़ात पर पहुँचने से पहले ही एहराम के कपड़े पहन ले अथवा एहराम के कपड़े अपने पास रखे, ताकि मीक़ात पर पहुँचते ही उन्हें पहन सके। जो व्यक्ति विमान में एहराम के कपड़े पहनना भूल जाए अथवा जिसके लिए बैग से कपड़े निकालना संभव न हो, वह अपने पहने हुए वस्त्र उतारकर एक चादर और एक लुंगी पहन ले। यदि लुंगी पहनने का अवसर न मिले, तो फ़िलहाल पाजामा या पैंट पहनकर ही अपना सतर ढक ले। फिर अवसर मिलते ही पाजामा उतारकर एहराम के कपड़े पहन ले। इसके लिए उसे कोई प्रायश्चित नहीं देना होगा। क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया :
«مَنْ لَمْ يَجِدْ إِزَارًا فَلْيَلْبَسِ السَّرَاوِيلَ.»
‘जिसके पास लुंगी न हो, वह पाजामा पहन ले।’[2]
२. बहुत-सी महिलाएँ यह समझती हैं कि एहराम के लिए काले, हरे या सफ़ेद रंग जैसे कुछ विशेष वस्त्र होते हैं। इसका कोई आधार नहीं है। महिलाएँ कोई भी कपड़ा पहन सकती हैं। लेकिन वह वस्त्र सौंदर्य-प्रदर्शन में सहायक अथवा पुरुषों या ग़ैर-मुस्लिमों से मिलता-जुलता नहीं होना चाहिए।
३. बहुत-से लोगों का मानना है कि एहराम के कपड़े मैले या फट जाने पर भी उन्हें बदला नहीं जा सकता। यह सही नहीं है। सही बात यह है कि मुहरिम को एहराम के कपड़े उतारने और जब चाहे बदलने की अनुमति है।
४. बहुत-सी महिलाएँ अपने चेहरे और नक़ाब के बीच लकड़ी या ऐसी ही कोई वस्तु रखती हैं, ताकि नक़ाब उनके चेहरे को न छुए। यह भी एक निराधार प्रथा है। इस्लाम के आरंभिक युग में किसी मुस्लिम महिला ने ऐसा नहीं किया। बल्कि ग़ैर-महरम पुरुषों के सामने आने पर महिलाएँ चेहरे पर नक़ाब लगाए बिना दुपट्टा लटकाकर अपना चेहरा छिपाएँगी। ग़ैर-महरम पुरुष न होने पर चेहरा खुला रखेंगी। दुपट्टा उनके चेहरे को छू जाए, तो भी कोई समस्या नहीं है।
५. उमरा या हज करने की नीयत के बावजूद बहुत-सी महिलाएँ हैज़ या निफ़ास की अवस्था में मीक़ात से एहराम नहीं बाँधतीं। यह एक स्पष्ट भूल है। निफ़ास या हैज़ वाली महिला के लिए भी मीक़ात से एहराम बाँधना फ़र्ज़ है। इसके अतिरिक्त, निफ़ास और हैज़ से रहित सामान्य महिलाओं की तरह उनके लिए भी ग़ुस्ल करने और पवित्रता प्राप्त करने का विधान है। निफ़ास और हैज़ वाली महिलाएँ अन्य सभी हज और उमरा करने वालों की तरह सारे कार्य कर सकती हैं। केवल पवित्र होने तक वे बैतुल्लाह का तवाफ़ नहीं कर सकतीं। क्योंकि जब अस्मा बिन्त उमैस को मीक़ात पर (बच्चा पैदा करने के बाद) निफ़ास शुरू हुआ, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे फ़रमाया,
«اغْتَسِلِى وَاسْتَثْفِرِى بِثَوْبٍ وَأَحْرِمِى.»
‘ग़ुस्ल करो, कपड़े से रक्त को रोको और एहराम बाँध लो।’[3] और एहराम की अवस्था में आयशा रज़ि. का मासिक धर्म शुरू होने पर उन्होंने उनसे फ़रमाया,
«إِنَّ هَذَا أَمْرٌ كَتَبَهُ اللَّهُ عَلَى بَنَاتِ آدَمَ فَاقْضِي مَا يَقْضِي الْحَاجُّ غَيْرَ أَنْ لاَ تَطُوفِي بِالْبَيْتِ».
‘यह ऐसी बात है जिसे अल्लाह तआला ने आदम की बेटियों के लिए लिख दिया है। (यह तो होकर रहेगा) अतः तुम दूसरे हाजियों की तरह सारे कार्य कर सकती हो, केवल बैतुल्लाह का तवाफ़ न करना।’[4]
६. एहराम के समय दो रकअत नमाज़ पढ़ना वाजिब समझना।
७. बहुत-से लोग समझते हैं कि एहराम के कपड़े पहनते ही एहराम में निषिद्ध कार्यों से बचना आवश्यक हो जाता है; लेकिन सही बात यह है कि बंदा जब एहराम बाँधने की नीयत करता है, तभी वे कार्य निषिद्ध होते हैं। चाहे वह एहराम के कपड़े उससे पहले पहने या उसके बाद।
८. बहुत-से लोग बच्चों और किशोरों को एहराम बँधवाने के बाद उन्हें थका हुआ देखकर उनका हज भंग कर देते हैं। यह भी ग़लत है। बल्कि बच्चे के अभिभावक को चाहिए कि वह हज के कार्यों को सही ढंग से पूरा करने में उसे सहायता और सहयोग दे। जिन कार्यों को वह पूरा नहीं कर सकेगा, अभिभावक उसकी ओर से उन्हें पूरा करेगा।
९. सामूहिक स्वर में तलबिया पढ़ना शरीयत द्वारा अनुमोदित नहीं है। क्योंकि तलबिया एक ऐसी इबादत है जिसे केवल उसी प्रकार किया जा सकता है, जिस प्रकार उसका वर्णन किया गया है। और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम या उनके सहाबा-ए-किराम द्वारा सामूहिक स्वर में तलबिया पढ़ने का कोई प्रमाण नहीं मिलता।
१०. निरर्थक बातों या कार्यों और ऐसे कामों में व्यस्त होकर तलबिया पढ़ना छोड़ देना, जिन्हें बाद में भी किया जा सकता है। इससे भी अधिक भयानक बात यह है कि ग़ीबत, चुग़ली, गाने अथवा किसी निरर्थक कार्य में बहुमूल्य समय नष्ट करना।
टिप्पणी
[1]. बुख़ारी : १५२४, मुस्लिम : ११८१।
[2]. बुख़ारी : १८४३, मुस्लिम : ११७८।
[3]. पूर्वोक्त।
[4]. बुख़ारी : २९४; मुस्लिम : १२११।