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हज गाइड

हज की फ़ज़ीलत और महत्त्व

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हज का महत्व

5 मिनट में पढ़ेंआखिरी अपडेट 23 अगस्त 2026

इस्लामी इबादतों में हज्ज का महत्व अपरिमित है। एक हदीस के अनुसार हज्ज को सर्वश्रेष्ठ इबादत कहा गया है।[1] लेकिन हज्ज का यह महत्व बाहरी रीति-रिवाजों से अधिक हज्ज की रूह या हकीकत से जुड़ा हुआ है। हज्ज की इस रूह या हकीकत को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है—

  1. एहराम के कपड़े पहनकर सगे-संबंधियों को छोड़ते हुए हज्ज की यात्रा पर रवाना होना, कफ़न पहनकर सगे-संबंधियों को छोड़ते हुए आख़िरत की यात्रा पर रवाना होने की याद दिलाता है।

  2. हज्ज की यात्रा के लिए रास्ते का सामान साथ लेना, आख़िरत की यात्रा के लिए रास्ते का सामान साथ लेने की आवश्यकता की याद दिलाता है।

  3. एहराम पहनकर पाक-साफ़ हो जाना और अल्लाह के दरबार में हाज़िरी देने के लिए ‘लब्बैक’ कहना, सभी गुनाहों-पापों से पाक होकर परलोक में अल्लाह के समक्ष हाज़िर होने की आवश्यकता की याद दिलाता है। यह भी याद दिलाता है कि एहराम के कपड़ों की तरह स्वच्छ-सफ़ेद हृदय लेकर ही अल्लाह के दरबार में जाना होगा।

  4. ‘लब्बैका अल्लाहुम्मा लब्बैक’ कहकर बंदा हज्ज के संबंध में अल्लाह की पुकार का उत्तर देते हुए यह घोषणा करता है कि वह अल्लाह की किसी भी पुकार का उत्तर देने के लिए सदा तैयार है। और वह यह व्यक्त करता है कि बाधाओं, विपत्तियों और कष्टों-यातनाओं को पार करके किसी भी मंज़िल तक पहुँचने के लिए वह एक पैर पर खड़ा है।

  5. एहराम की अवस्था में सभी नियमों और निषेधों का पालन करना स्पष्ट संकेत देता है कि मोमिन का जीवन बेलगाम नहीं है। मोमिन का जीवन अल्लाह की रस्सी से बँधा है। अल्लाह जिस ओर खींचते हैं, वह उस ओर जाने के लिए तैयार रहता है। यहाँ तक कि यदि वह सामान्य पहनावे से रोक दें, सौंदर्य-प्रसाधन, इत्र और स्नो का इस्तेमाल तथा पति-पत्नी के बीच मनोरंजन निषिद्ध कर दें, तो वह तत्काल इन सब से रुक जाता है। अल्लाह की इच्छा के सामने वह वैध, बल्कि अत्यंत आवश्यक चीज़ों को भी छोड़ने में तनिक भी संकोच नहीं करता।

  6. एहराम की अवस्था में झगड़ा करना निषिद्ध है। इसका अर्थ है कि मोमिन झगड़ालू स्वभाव का नहीं होता। मोमिन जीवन के प्रत्येक चरण में क्षमा और धैर्य का उदाहरण प्रस्तुत करता है। मोमिन शांतिप्रिय होता है। झगड़े-विवाद से ऊपर उठकर वह पवित्र और सहनशील जीवन जीने का अभ्यस्त होता है।

  7. बैतुल्लाह के सान्निध्य में पहुँचकर मोमिन सुरक्षा अनुभव करता है। क्योंकि अल्लाह तआला ने बैतुल्लाह को सुरक्षा की निशानी बनाया है।[2] यात्रा के कष्ट और यातनाएँ सहकर बैतुल्लाह की शरण में पहुँचकर मोमिन एक अकल्पनीय सुरक्षा अनुभव करता है। इसी प्रकार शिर्क-मुक्त ईमानी जीवन जीने के लंबे प्रयास और साधना के बाद मोमिन अल्लाह के पास जाकर जो सुरक्षा पाएगा, यह उसका प्रारंभिक उदाहरण है।[3]

  8. हजरे असवद को चूमना और स्पर्श करना मोमिन के हृदय में सुन्नत की ताज़ीम और सम्मान की चेतना उत्पन्न करता है। क्योंकि केवल एक पत्थर को चूमने का माहात्म्य क्या है, यह हमारी समझ के दायरे से बाहर है। फिर भी हम उसे चूमते हैं, क्योंकि रसूलुल्लाह (ﷺ) ने ऐसा किया है। बात समझ में आए या न आए, हम केवल रसूलुल्लाह (ﷺ) का अनुसरण करने के लिए ही हजरे असवद को चूमते हैं। यह चुंबन बिना किसी शर्त के रसूलुल्लाह (ﷺ) की आज्ञाकारिता में स्वयं को समर्पित करने की एक निशानी है। उमर (रज़ि.) ने हजरे असवद को चूमने से पहले कहा, ‘मैं जानता हूँ कि निश्चय ही तुम एक पत्थर हो। तुम्हारे पास न हानि पहुँचाने की शक्ति है, न लाभ देने की। यदि मैंने रसूलुल्लाह (ﷺ) को तुम्हें चूमते हुए न देखा होता, तो मैं तुम्हें न चूमता।’[4] अतः हजरे असवद का चुंबन तर्क के पीछे न घूमकर अल्लाह और रसूल की बिना शर्त आज्ञाकारिता की चेतना सिखाता है, जो धार्मिक नीति-आदर्शों के दायरे में जीवन जीना सरल और सहज बना देती है।

  9. तवाफ़ अल्लाह-केंद्रित जीवन की निरंतर साधना को दर्शाता है। अर्थात एक मोमिन का जीवन अल्लाह के आदेशों और निषेधों के इर्द-गिर्द घूमता है। एक अल्लाह को सभी कार्यों का केंद्र बनाकर मोमिन का पूरा जीवन व्यतीत होता है। बैतुल्लाह के चारों ओर घूमना अल्लाह की महान निशानी के चारों ओर घूमना है। तौहीद के अंतरराष्ट्रीय केंद्र के चारों ओर घूमना है। तौहीद पर आधारित जीवन जीने की गहरी प्रतिबद्धता व्यक्त करना है। और सात चक्कर अंतिम सीमा को दर्शाते हैं। अर्थात ऐसा नहीं है कि मोमिन अपने जीवन के एक भाग को तौहीद के चारों ओर घुमाता रखेगा और बाकी भाग को किसी अन्य धुरी के इर्द-गिर्द घुमाएगा। मोमिन का शरीर और आत्मा तथा उसका संपूर्ण अंतर्बाह्य केवल अल्लाह के इर्द-गिर्द घूमता है, जिसे पवित्र क़ुरआन में ‘पूर्ण रूप से इस्लाम में प्रवेश करो’[5] कहकर व्यक्त किया गया है।

  10. अल्लाह तआला ने नारी को सम्मानित बनाया है। सफ़ा और मरवा के बीच सात चक्कर अल्लाह की रहमत और मदद पाने की कामना में एक नारी की असीम मेहनत और दौड़-धूप की याद दिलाते हैं। जिस श्रम और मेहनत के बाद रहमत का सोता ‘ज़मज़म’ प्रवाहित हुआ था। सई को सात चक्करों में पूरा करना होता है, जो यह याद दिलाता है कि अल्लाह की रहमत और सहायता पाने के लिए सात चक्कर, अर्थात बहुत अधिक प्रयास और मेहनत की आवश्यकता होती है। माँ हाजरा की तरह छोटे-छोटे पत्थरों से भरे रास्ते पर सफ़ा से मरवा और मरवा से सफ़ा तक दौड़-धूप करने की आवश्यकता है। पथरीले रास्ते पर सात चक्कर, अर्थात अत्यधिक मेहनत के बिना दुनिया और आख़िरत की कोई भी चीज़ प्राप्त नहीं की जा सकती—यह नियम हमें स्पष्ट रूप से समझा देता है।

  11. वुक़ूफ़े अरफ़ा क़यामत के मैदान की याद दिलाता है, जहाँ पूरी मानवजाति एक विस्तृत मैदान में एकत्रित होगी। जहाँ वस्त्रहीन अवस्था में लंबे समय तक खड़े रहकर प्रतीक्षा की घड़ियाँ गिननी होंगी। सही ईमान और अमल वाले लोग अल्लाह की कृपा से बच जाएँगे। और ईमान से वंचित तथा त्रुटिपूर्ण ईमान और अमल वाले लोगों को अनंत अज़ाब भुगताने के लिए ज़ंजीरें पहनाकर जहन्नम की ओर हाँकते हुए ले जाया जाएगा।

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[1] -देखें : बुख़ारी : हदीस नं. 25

[2] - وَإِذْ جَعَلْنَا الْبَيْتَ مَثَابَةً لِلنَّاسِ وَأَمْنًا (सूरा अल-बक़रा : 125)

[3] - الَّذِينَ آَمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُوا إِيمَانَهُمْ بِظُلْمٍ أُولَئِكَ لَهُمُ الْأَمْنُ وَهُمْ مُهْتَدُونَ(الأنعام:81) अर्थात जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अपने ईमान को शिर्क-अन्याय के साथ मिश्रित नहीं किया, उनके लिए सुरक्षा है और वही मार्गदर्शन प्राप्त लोग हैं।

[4] - إني أعلم أنك حجر لا تضر ولا تنفع ، ولولا أني رأيت النبي صلى الله عليه وسلم يقبلك ما قبلتك (बुख़ारी : हदीस नं. 1520)

[5] - يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا ادْخُلُوا فِي السِّلْمِ كَافَّةً (सूरा अल-बक़रा : 208)