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हज गाइड

हज की फ़ज़ीलत और महत्त्व

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हज्ज की फ़ज़ीलत

4 मिनट में पढ़ेंआखिरी अपडेट 23 अगस्त 2026

मब्रूर हज का प्रतिफल जन्नत के सिवा और कुछ नहीं है।[1] जिसने हज किया और ऐसे कार्यों से बचा जिनकी शरीअत अनुमति नहीं देती तथा यौन-स्पर्श वाले कार्यों और बातों से दूर रहा, वह उस दिन की तरह पवित्र होकर लौटा जिस दिन वह अपनी माँ के गर्भ से पैदा हुआ था।[2] अरफ़ा के दिन अल्लाह तआला जितने लोगों को जहन्नम से मुक्ति देते हैं, उतने किसी अन्य दिन नहीं देते। इस दिन अल्लाह तआला निकट आते हैं और अरफ़ा के मैदान में ठहरे हुए हाजियों को लेकर फ़रिश्तों के सामने गर्व करते हैं तथा कहते हैं, ‘ये क्या चाहते हैं?’[3]

एक व्यक्ति ने रसूलुल्लाह (ﷺ) से पूछा कि सबसे उत्तम अमल क्या है। उत्तर में उन्होंने कहा, ‘एकमात्र अल्लाह पर ईमान और उसके बाद मब्रूर हज, जो समस्त अमलों से श्रेष्ठ है। दोनों के बीच उतना ही अंतर है जितना सूर्य के उदय और अस्त होने के बीच।’[4] एक अन्य हदीस में आया है, ‘रसूलुल्लाह (ﷺ) से पूछा गया कि उत्तम अमल क्या है। उत्तर में उन्होंने कहा, ‘अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान।’ पूछा गया, ‘उसके बाद क्या?’ उन्होंने कहा, ‘अल्लाह की राह में जिहाद।’ पूछा गया, ‘फिर कौन-सा?’ उन्होंने कहा, ‘मब्रूर हज।’[5] एक बार आयशा (रज़ि.) ने रसूलुल्लाह (ﷺ) से पूछा, ‘या रसूलुल्लाह! क्या हम आपके साथ जिहाद और अभियानों में नहीं जाएँगी?’ उन्होंने कहा, ‘तुम्हारे लिए सबसे उत्तम और सुंदर जिहाद ‘हज’, अर्थात मब्रूर हज है।’[6] ‘हज और उमरा करने वाले अल्लाह के वफ़्द-मेहमान हैं। यदि वे अल्लाह को पुकारते हैं तो अल्लाह उनकी पुकार का उत्तर देते हैं। यदि वे गुनाहों की माफ़ी माँगते हैं तो अल्लाह उनके गुनाह माफ़ कर देते हैं।’[7] अबू हुरैरा से वर्णित एक हदीस में आया है कि रसूलुल्लाह (ﷺ) ने कहा, ‘एक उमरा से दूसरे उमरे तक, इन दोनों के बीच जो कुछ (पाप) होगा, उसका कफ़्फ़ारा है। और मब्रूर हज का प्रतिफल जन्नत के सिवा और कुछ नहीं है।’[8] हदीस में यह भी आया है कि रसूलुल्लाह (ﷺ) ने कहा, ‘किसी व्यक्ति का इस्लाम स्वीकार करना उसके पूर्व के सभी पापों को मिटा देता है। हिजरत उसके पूर्व के सभी गुनाहों को मिटा देती है और हज उसके पूर्व के सभी पापों को मिटा देता है।’[9] इब्ने मसऊद से वर्णित एक हदीस में आया है, ‘तुम लगातार हज और उमरा किया करो, क्योंकि ये निर्धनता और पापों को उसी तरह दूर कर देते हैं, जैसे लोहार की धौंकनी लोहे, सोने और चाँदी की मैल को दूर कर देती है। और हज्जे-मब्रूर का सवाब तो जन्नत के सिवा और कुछ नहीं है।’[10]

ऊपर उल्लिखित हदीसों के कथन अत्यंत स्पष्ट हैं। इसलिए हज करने की इच्छा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि पवित्र हज की इन फ़ज़ीलतों को भरपूर रूप से प्राप्त करने के लिए जी-जान से प्रयास करता रहे। हज के क़बूल होने की सभी शर्तें पूरी करते हुए, समस्त पापों और गुनाहों से बचकर अपने आप पर कठोरता से नियंत्रण रखे।

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[1] - والحج المبرور ليس له جزاء إلا الجنة (बुख़ारी : हदीस नं. १६५०)

[2] - فلم يرفث ولم يفسق ، رجع كيوم ولدته أمه من حج لله (बुख़ारी : हदीस नं. १४२४)

[3] - मुस्लिम : २/९८३

[4] - عن ماعز التميمي ु رضى الله عنه ु عن النبي صلى الله عليه وسلم : أنه سئل أي الأعمال أفضل ؟ قال : إيمان بالله وحده ، ثم حجة برة تفضل سائر الأعمال ، كما بين مطلع الشمس إلى مغربها (अहमद : ४/३४२)

[5] - سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم ، أي الأعمال أفضل ؟ قال : الإيمان بالله ورسوله ، قيل : ثم ماذا ؟ قال جهاد في سبيل الله ، قيل ثم ماذا ؟ قال حج مبرور (बुख़ारी : १४२२)

[6] - عن عائشة أم المؤمنين ु رضى الله عنها ु قالت : قلت يارسول الله ، ألا نغزو ونجاهد معكم ؟ قال : لَكُنَّ أفضل الجهاد وأجمله الحج ، حج مبرور (बुख़ारी की व्याख्या फ़त्हुल बारी : ४/१८६१)

[7] - عن أبي هريرة رضى الله عنه ، أن رسول الله قال : الحجاج والعمار وفد الله ، إن دعوه أجابهم وان استغفروه غفر لهم इब्ने माजाह : हदीस नं. २८८३)

[8] - عن أبي هريرة رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال : العمرة إلى العمرة كفارة لما بينهما ، والحج المبرور ليس له جزاء إلا الجنة ،، (बुख़ारी : हदीस नं. १६५०)

[9] - إن الإسلام يهدم ما كان قبله ، و أن الهجرة تهدم ما كان قبلها ، وأن الحج يهدم ما كان قبله ،، (मुस्लिम : हदीस नं. १७३)

[10] - تابعوا بين الحج والعمرة ، فإنهما ينفيان الفقر والذنوب كما ينفي الكير خبث الحديد والذهب والفضة وليس للحج المبرور ثواب إلا الجنة (अलबानी : सहीहुन्नसाई : २/५५८)