तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा फ़र्ज़ है और इसी तवाफ़ के माध्यम से हज पूर्ण होता है। तवाफ़-ए-इफ़ाज़ा को तवाफ़-ए-ज़ियारत भी कहा जाता है। फिर बहुत से लोग इसे हज का तवाफ़ भी कहते हैं। इसके बिना हज सही नहीं होगा। अल्लाह तआला फ़रमाते हैं,
﴿ ثُمَّ لۡيَقۡضُواْ تَفَثَهُمۡ وَلۡيُوفُواْ نُذُورَهُمۡ وَلۡيَطَّوَّفُواْ بِٱلۡبَيۡتِ ٱلۡعَتِيقِ ٢٩ ﴾ [الحج: ٢٩]
‘फिर वे साफ़-सुथरे हों, अपनी मन्नतें पूरी करें और प्राचीन घर का तवाफ़ करें।’[1]
[1]. हज : २९।