सीधे कंटेंट पर जाएं

हज गाइड

८ ज़िलहज

अध्याय के पेज

मिना जाने से पहले या बाद में हाजी जो गलतियाँ करते हैं

6 मिनट में पढ़ेंआखिरी अपडेट 11 सितंबर 2026

१. नफ़्ल तवाफ़ के माध्यम से हज की सई पहले ही कर लेना

8 ज़िलहज को हज का इहराम बाँधने के बाद तवाफ़-सई करना। बहुत-से तमत्तु हज करने वाले हज का यह इहराम बाँधने के बाद नफ़्ल तवाफ़ करके सई कर लेते हैं। ऐसा करने का उल्लेख हदीस में नहीं है। सहाबा-ए-किराम में से भी किसी ने ऐसा किया हो, इसका कोई प्रमाण नहीं है। चूँकि हदीस में तथा सहाबा-ए-किराम और सलफ़े-सालिहीन के युग में ऐसा करने का कोई प्रमाण नहीं है, इसलिए इसे अवश्य छोड़ देना चाहिए। अन्यथा सुन्नत के स्थान पर बिदअत स्थापित हो जाएगी। अतः इहराम बाँधकर या इहराम के बिना, किसी भी तरह उस दिन तवाफ़-सई करने न जाएँ। जिन सहाबा ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ तमत्तु किया था, उन्होंने 8 ज़िलहज को इहराम बाँधने से पहले या बाद में किसी प्रकार की सई करना तो दूर, तवाफ़ भी नहीं किया था। आयशा रज़ि. कहती हैं, ‘विदाई हज के वर्ष हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ निकले... जिन लोगों ने उमरा के लिए इहराम बाँधा था, वे तवाफ़ और सई करके हलाल हो गए थे। इसके बाद मीना से लौटने पर उन्होंने हज के लिए तवाफ़ किया।’[1] यदि 8 तारीख़ को तवाफ़ या सई करने की गुंजाइश होती, तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अवश्य सहाबा को इसकी जानकारी देते और सहाबा भी इसे नहीं छोड़ते। हनफ़ी फ़िक़्ह की प्रसिद्ध पुस्तक बदायिउस्सनाए में लिखा है :

وَإِذَا أَحْرَمَ الْمُتَمَتِّعُ بِالْحَجِّ فَلَا يَطُوفُ بِالْبَيْتِ ، وَلَا يَسْعَى فِي قَوْلِ أَبِي حَنِيفَةَ ، وَمُحَمَّدٍ ؛ لِأَنَّ طَوَافَ الْقُدُومِ لِلْحَجِّ لِمَنْ قَدِمَ مَكَّةَ بِإِحْرَامِ الْحَجِّ ، وَالْمُتَمَتِّعُ إنَّمَا قَدِمَ مَكَّةَ بِإِحْرَامِ الْعُمْرَةِ لَا بِإِحْرَامِ الْحَجِّ ، وَإِنَّمَا يُحْرِمُ لِلْحَجِّ مِنْ مَكَّةَ ، وَطَوَافُ الْقُدُومِ لَا يَكُونُ بِدُونِ الْقُدُومِ ، وَكَذَلِكَ لَا يَطُوفُ ، وَلَا يَسْعَى أَيْضًا ؛ لِأَنَّ السَّعْيَ بِدُونِ الطَّوَافِ غَيْرُ مَشْرُوعٍ ، وَلِأَنَّ الْمَحَلَّ الْأَصْلِيَّ لِلسَّعْيِ مَا بَعْدَ طَوَافِ الزِّيَارَةِ ؛ لِأَنَّ السَّعْيَ وَاجِبٌ ، وَطَوَافُ الزِّيَارَةِ فَرْضٌ ، وَالْوَاجِبُ يَصْلُحُ تَبَعًا لِلْفَرْضِ ، فَأَمَّا طَوَافُ الْقُدُومِ فَسُنَّةٌ . وَالْوَاجِبُ لَا يَتْبَعُ السُّنَّةَ إلَّا أَنَّهُ رَخَّصَ تَقْدِيمَهُ عَلَى مَحَلِّهِ الْأَصْلِيّ عَقِيبَ طَوَافِ الْقُدُومِ فَصَارَ وَاجِبًا عَقِيبَهُ بِطَرِيقِ الرُّخْصَةِ ، وَإِذَا لَمْ يُوجَدْ طَوَافُ الْقُدُومِ يُؤَخَّرُ السَّعْيُ إلَى مَحَلِّهِ الْأَصْلِيِّ فَلَا يَجُوزُ قَبْلَ طَوَافِ الزِّيَارَةِ.

‘तमत्तु हज करने वाला जब हज का इहराम बाँधे, तो वह बैतुल्लाह का तवाफ़ न करे और न सई करे। यह इमाम अबू हनीफ़ा रह. और इमाम मुहम्मद रह. का मत है। क्योंकि तवाफ़े-क़ुदूम उस व्यक्ति के लिए निर्धारित है जो हज का इहराम बाँधकर मक्का पहुँचा हो। इसके विपरीत, तमत्तु हज करने वाला उमरा का इहराम बाँधकर मक्का पहुँचा है, हज का इहराम बाँधकर नहीं। तमत्तु हज करने वाला मक्का से ही हज का इहराम बाँधता है। और तवाफ़े-क़ुदूम बाहर से आने के बिना नहीं होता। वह तवाफ़-सई इसलिए भी नहीं करेगा कि तवाफ़ के बिना सई करना शरीअत-सम्मत नहीं है। क्योंकि सई का मूल स्थान तवाफ़े-ज़ियारत के बाद है। इसका कारण यह है कि सई वाजिब है और तवाफ़े-ज़ियारत फ़र्ज़ है। वाजिब, फ़र्ज़ के अधीन या उसके अनुवर्ती हो सकता है। इसके विपरीत, तवाफ़े-क़ुदूम सुन्नत है और वाजिब, सुन्नत के अधीन या उसका अनुवर्ती नहीं हो सकता। हालाँकि तवाफ़े-क़ुदूम की स्थिति में सई को उसके मूल स्थान से पहले करने की अनुमति दी गई है। इसी अनुमति के कारण तवाफ़े-क़ुदूम के बाद ‘वाजिब’ अदा करना संभव हुआ है। अतः तवाफ़े-क़ुदूम न होने की स्थिति में सई को उसके मूल स्थान तक विलंबित करना होगा। इसलिए तवाफ़े-ज़ियारत से पहले सई करना जायज़ नहीं होगा।[2]

उपर्युक्त चर्चा के आलोक में कहा जा सकता है कि हमारे बांग्लादेशी हाजी मीना जाते समय इहराम बाँधकर, नफ़्ल तवाफ़ करके जिस प्रकार हज की सई पहले ही पूरी कर लेते हैं, वह बिल्कुल भी शरीअत-सम्मत नहीं है। क्योंकि इसके समर्थन में क़ुरआन, सुन्नत और सहाबा के अमल से कोई दलील या प्रमाण नहीं है। अतः शरीअत-विरोधी इस बिदअत को छोड़ दें।

२. मस्जिदे-हराम जाकर इहराम बाँधना

मस्जिदे-हराम जाकर इहराम बाँधना।[3] विदाई हज में सहाबा-ए-किराम ने अपने-अपने निवास-स्थल से इहराम बाँधा था। यदि मस्जिदे-हराम के भीतर या बाहर किसी निश्चित स्थान से इहराम बाँधने का विधान होता, तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उन्हें इस संबंध में निर्देश देते और सहाबा-ए-किराम प्राथमिकता के साथ उस पर अमल करते।

३. 8 तारीख़ को मीना पहुँचने तक इहराम बाँधने में विलंब करना। यह जायज़ है, परंतु उत्तम नहीं। क्योंकि विदाई हज में सहाबा ने अपने-अपने निवास-स्थल से इहराम बाँधा था। इसके बाद वे मीना की ओर रवाना हुए थे।[4]

४. कुछ हाजी समझते हैं कि उमरा में पहने गए इहराम के कपड़ों को बिना धोए हज के लिए पहनना वैध नहीं है। यह ग़लत धारणा है। क्योंकि इहराम के कपड़ों का नया और साफ़ होना शर्त नहीं है। साफ़ हों तो अच्छा है, लेकिन वाजिब नहीं।

५. बहुत-से हाजी मीना के लिए रवाना होते समय ऊँची आवाज़ में तलबिया नहीं पढ़ते, जबकि ऊँची आवाज़ में पढ़ना सुन्नत है। क्योंकि,

क. रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,

أَتَانِي جِبْرِيلُ ، فَقَالَ : إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُكَ أَنْ تَأْمُرَ أَصْحَابَكَ أَنْ يَرْفَعُوا أَصْوَاتَهُمْ بِالتَّلْبِيَةِ ، فَإِنَّهَا مِنْ شِعَارِ الْحَجِّ .

‘जिबरील मेरे पास आए और कहा, निश्चय ही अल्लाह आपको आदेश दे रहे हैं कि आप अपने सहाबा को निर्देश दें कि वे ऊँची आवाज़ में तलबिया पढ़ें। क्योंकि यह हज के नारों में शामिल है।’[5]

ख. नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा गया कि कौन-सा हज उत्तम है? उन्होंने फ़रमाया, ‘अल-अज्जु वस्सज्जु।’[6] अल-अज्जु का अर्थ तलबिया के द्वारा आवाज़ ऊँची करना है और अस्सज्जु का अर्थ हदी या क़ुर्बानी के पशु का रक्त बहाना है।

ग. सहाबा-ए-किराम ने इस आदेश का पालन किया। उन्होंने ऊँची आवाज़ में तलबिया पढ़ा। वे बाक़ायदा बहुत ऊँची आवाज़ में तलबिया पढ़ते थे। यहाँ तक कि इसके कारण उनकी आवाज़ बैठ गई थी।[7] इमाम नववी रह. तलबिया की आवाज़ ऊँची करने के संबंध में कहते हैं, ‘इस पर सर्वसम्मति है। लेकिन शर्त यह है कि आवाज़ संतुलित रूप से ऊँची की जाए, ताकि स्वयं को कष्ट न हो।

और महिलाएँ इतनी आवाज़ में पढ़ें कि वे स्वयं सुन सकें। क्योंकि उनकी ऊँची आवाज़ से फ़ितने की आशंका है।’[8] इब्न अब्दिल बर्र वर्णन करते हैं, ‘इस विषय में सर्वसम्मत मत यह है कि महिलाएँ बहुत ऊँची आवाज़ में तलबिया नहीं पढ़ेंगी, बल्कि इतनी आवाज़ में पढ़ेंगी कि वे स्वयं सुन सकें।’[9] इस संबंध में सहाबा-ए-किराम से भी वर्णन आया है। इब्न अब्बास रज़ि. कहते हैं, ‘महिलाएँ ऊँची आवाज़ में तलबिया नहीं पढ़ेंगी।’[10] इब्न उमर रज़ि. ने कहा, ‘महिलाओं को ऊँची आवाज़ में तलबिया पढ़ने की अनुमति नहीं है।’[11]

६. कुछ हाजी मीना में दो वक़्त की नमाज़ों को एक साथ मिलाकर अदा करते हैं। वहीं कुछ लोग चार रकअत वाली नमाज़ों में क़सर नहीं करते। जबकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से वर्णित है कि उन्होंने मीना में दो वक़्त की नमाज़ों को एक साथ मिलाकर अदा न करके, अलग-अलग क़सर की थी। और मुसलमानों के समस्त कार्यों में सुन्नत का अनुसरण करना अत्यंत आवश्यक है।

[1]. बुख़ारी : 1556, मुस्लिम : 1112।

[2]. अल-कासानी : बदायिउस्सनाए : 2/347।

[3]. याद रखें, इहराम बाँधने के संबंध में दो सुन्नतें हैं। एक, पवित्र मक्का में हरम की सीमा के भीतर स्थित अपने निवास-स्थल से इहराम बाँधना। दो, 8 तारीख़ को सूर्योदय के बाद से सूर्य ढलने से पहले किसी भी समय इहराम बाँधना।

[4]. लेकिन यदि किसी कारण से किसी व्यक्ति को 7 तारीख़ को मीना जाना पड़े, तो उसके लिए उत्तम यह है कि 8 तारीख़ को वह जहाँ हो, वहीं से इहराम बाँधे, चाहे वह मीना ही क्यों न हो। क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने 8 तारीख़ को इहराम बाँधा था, उससे पहले नहीं।

[5]. अहमद : 21722, इब्न हिब्बान : 3803।

[6]. हाकिम : 1655, बैहक़ी : 3974।

[7]. मुसन्नफ़ इब्न अबी शैबा : 4/464।

[8]. शरहु मुस्लिम लिन-नववी : 4/351।

[9]. अल-इस्तिज़कार : 4/57; बिदायतुल मुज्तहिद : 1/467।

[10]. मुसन्नफ़े इब्न अबी शैबा : 4/416; सुनने बैहक़ी : 5/46।

[11]. मुसन्नफ़े इब्न अबी शैबा : 4/416; उमदतुल क़ारी : 9/171।