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हज गाइड

९ ज़िलहज

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9 ज़िलहिज्जा : अरफ़ा दिवस - अरफ़ा दिवस की फ़ज़ीलत

6 मिनट में पढ़ेंआखिरी अपडेट 10 सितंबर 2026

अरफ़ा दिवस की फ़ज़ीलत

ज़िलहज्ज महीने की 9 तारीख़ को ‘यौमु अरफ़ा’ या अरफ़ा दिवस कहा जाता है। इस दिन अरफ़ा में ठहरना हज का सबसे श्रेष्ठ अमल है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, ‘हज अरफ़ा है।’[1] अतः अरफ़ा में ठहरना फ़र्ज़ है। अरफ़ा में ठहरे बिना हज सही नहीं होगा। इस दिन की फ़ज़ीलत यौमुन-नहर या क़ुर्बानी के दिन के क़रीब है। प्रत्येक हाजी भाई को चाहिए कि इस दिन अत्यंत गंभीरता से अमल करे। इस दिन की फ़ज़ीलत के बारे में विभिन्न हदीसें वर्णित हुई हैं। उनमें से कुछ नीचे उल्लिखित हैं :

1. अल्लाह तआला अरफ़ा के दिन बंदों के निकट होते हैं और सबसे अधिक संख्या में बंदों को जहन्नम की आग से मुक्ति देते हैं। आयशा रज़ि. से वर्णित है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,

«مَا مِنْ يَوْمٍ أَكْثَرَ مِنْ أَنْ يُعْتِقَ اللَّهُ فِيهِ عَبْدًا مِنَ النَّارِ مِنْ يَوْمِ عَرَفَةَ وَإِنَّهُ لَيَدْنُو ثُمَّ يُبَاهِى بِهِمُ الْمَلاَئِكَةَ فَيَقُولُ مَا أَرَادَ هَؤُلاَءِ»

‘ऐसा कोई दिन नहीं है जिसमें अल्लाह तआला अरफ़ा के दिन से अधिक बंदों को जहन्नम की आग से मुक्ति देते हों। अल्लाह उस दिन निकट होते हैं और उन्हें लेकर फ़रिश्तों के सामने गर्व करते हुए कहते हैं, ये क्या चाहते हैं?’[2]

2. अल्लाह तआला अरफ़ा में ठहरने वालों को लेकर आकाशवासियों के सामने गर्व करते हैं। अबू हुरैरा रज़ि. से वर्णित है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,

«إِنَّ اللَّهَ تَعَالَى يُبَاهِى بِأَهْلِ عَرَفَاتٍ أَهْلَ السَّمَاءِ فَيَقُولُ لَهُمُ : انْظُرُوا إِلَى عِبَادِى جَاءُونِى شُعْثًا غُبْرًا»

‘निश्चय ही अल्लाह तआला अरफ़ा में ठहरने वालों को लेकर आकाशवासियों के सामने गर्व करते हैं। वह उनसे कहते हैं, मेरे बंदों की ओर देखो, वे बिखरे बालों और धूल से लथपथ अवस्था में मेरे पास आए हैं।’[3]

3. अरफ़ा का दिन मुस्लिम समुदाय को प्रदान किए गए अल्लाह के दीन और नेमत के पूर्ण होने का दिन है। तारिक़ इब्न शिहाब कहते हैं, ‘यहूदियों ने उमर रज़ि. से कहा, आप लोग एक आयत पढ़ते हैं, यदि वह हम पर नाज़िल होती तो हम उसके नाज़िल होने के दिन को त्योहार के रूप में मनाते। उमर रज़ि. ने कहा, मैं अवश्य जानता हूँ कि वह किस उद्देश्य से और कहाँ नाज़िल हुई तथा उसके नाज़िल होने के समय रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कहाँ थे। वह अरफ़ा का दिन था। और अल्लाह की क़सम! हम अरफ़ा के मैदान में थे। (वह दिन जुमे का था) (आयत थी

﴿ٱلۡيَوۡمَ أَكۡمَلۡتُ لَكُمۡ دِينَكُمۡ ﴾ [المائ‍دة: ٣]

‘आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे दीन को पूर्ण कर दिया’)।[4]

4. जिब्रील अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की ओर से अरफ़ा में ठहरने वालों और मुज़दलिफ़ा में ठहरने वालों के लिए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तक सलाम पहुँचाया और उनके अपराधों की ज़िम्मेदारी ले ली। अनस रज़ि. से वर्णित है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अरफ़ा के मैदान में सूर्यास्त से पहले बिलाल रज़ि. को लोगों को शांत कराने का निर्देश दिया। बिलाल रज़ि. ने कहा, आप लोग रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए शांत हो जाएँ। जब लोग शांत हो गए तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,

«يَا مَعْشَرَ النَّاسِ أَتَانِيْ جِبْرِيْلُ آنِفًا فَأَقَرَأَنِيْ مِن رَّبِيْ السَّلاَمُ لأَهْلِ عَرَفَاتَ وَأَهْلِ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ وَضَمِنَ عَنْهُمْ التَّبِعَاتِ».

‘ऐ लोगो, कुछ समय पहले जिब्रील मेरे पास आए थे। उन्होंने मेरे रब की ओर से अरफ़ा में ठहरने वालों और मुज़दलिफ़ा में ठहरने वालों के लिए मुझे सलाम पहुँचाया और उनके अपराधों की ज़िम्मेदारी ले ली। उमर रज़ि. खड़े होकर बोले, ऐ अल्लाह के रसूल! क्या यह केवल हमारे लिए है? आपने फ़रमाया, यह तुम्हारे लिए और तुम्हारे बाद क़ियामत तक आने वालों के लिए है। उमर रज़ि. ने कहा, अल्लाह की रहमत अपार और उत्तम है।’[5]

5. अरफ़ा में ठहरने वालों को अल्लाह तआला विशेष रूप से क्षमा कर देते हैं। इब्न उमर से वर्णित है, वह कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,

«وَأَمَّا وُقُوفُكَ بِعَرَفَةَ فَإِنَّ اللهَ عَزَّ وَجَلَّ يَنْزِلُ إِلَى السَّمَاءِ الدُّنْيَا فَيُبَاهِي بِهِمُ الْمَلائِكَةَ، فَيَقُولُ:هَؤُلاءِ عِبَادِي جَاءُونِي شُعْثًا غُبْرًا مِنْ كُلِّ فَجٍّ عَمِيقٍ يَرْجُونَ رَحْمَتِي، وَيَخَافُونَ عَذَابِي، وَلَمْ يَرَوْنِي، فَكَيْفَ لَوْ رَأَوْنِي؟ فَلَوْ كَانَ عَلَيْكَ مِثْلُ رَمْلِ عَالِجٍ، أَوْ مِثْلُ أَيَّامِ الدُّنْيَا، أَوْ مِثْلُ قَطْرِ السَّمَاءِ ذُنُوبًا غَسَلَ اللَّهُ عَنْكَ».

‘और जहाँ तक अरफ़ा में तुम्हारे ठहरने की बात है, उस समय अल्लाह दुनिया के आकाश पर उतरते हैं। फिर अरफ़ा में ठहरने वालों को लेकर फ़रिश्तों के सामने गर्व करते हुए कहते हैं, ये मेरे बंदे हैं, ये बिखरे बालों और धूल से लथपथ होकर दूर-दराज़ के क्षेत्रों से मेरे पास आए हैं। ये मेरी ही रहमत की आशा रखते हैं और मेरी यातना से डरते हैं, जबकि इन्होंने मुझे देखा नहीं है। यदि देखते तो इनकी अवस्था कैसी होती? फिर यदि तुम्हारे पाप विशाल रेगिस्तान के रेत के कणों के बराबर, अथवा दुनिया के समस्त दिनों के बराबर, अथवा आकाश से बरसने वाली वर्षा की बूँदों के बराबर भी हों, तो अल्लाह उन्हें धोकर पूरी तरह साफ़ कर देंगे।’[6]

6. अरफ़ा दिवस की दुआ सर्वोत्तम दुआ है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,

«خَيْرُ الدُّعَاءِ دُعَاءُ يَوْمِ عَرَفَةَ».

‘सर्वोत्तम दुआ अरफ़ा दिवस की दुआ है।’[7]

7. जो लोग हज करने नहीं आए हैं, यदि वे अरफ़ा के दिन रोज़ा रखें तो उनके पिछले एक वर्ष और अगले एक वर्ष के गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं। अबू क़तादा रज़ि. से वर्णित है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अरफ़ा दिवस के रोज़े के बारे में पूछा गया तो आपने फ़रमाया,

«يُكَفِّرُ السَّنَةَ الْمَاضِيَةَ وَالْبَاقِيَةَ».

‘अरफ़ा दिवस का रोज़ा पिछले एक वर्ष और अगले एक वर्ष के गुनाहों को मिटा देता है।’[8]

लेकिन यह रोज़ा हाजियों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए है जो हज करने नहीं आए हैं। हाजियों के लिए अरफ़ा के दिन रोज़ा रखना सुन्नत के विरुद्ध है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने विदाई हज के समय अरफ़ा दिवस पर रोज़ा नहीं रखा था; बल्कि सबके सामने आपने दूध पिया था।’[9] इकरिमा कहते हैं, मैं अबू हुरैरा रज़ि. के घर गया और उनसे अरफ़ा दिवस पर अरफ़ा के मैदान में रहते हुए रोज़ा रखने के बारे में पूछा। उन्होंने कहा, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अरफ़ा के मैदान में अरफ़ा दिवस का रोज़ा रखने से मना किया है।[10] बल्कि इस दिन हाजी साहब का रोज़ा न रखना अधिक दुआ, ज़िक्र, इस्तिग़फ़ार और अल्लाह की इबादत-बंदगी करने में सहायक होता है।

[1]. मुस्नद अहमद, 4/335।

[2]. मुस्लिम : 1348।

[3]. मुस्नद अहमद : 2/224।

[4]. बुख़ारी : 4606। ‘अरफ़ा दिवस पर दीन को पूर्ण कर देने की व्याख्या में इब्न रजब रह. कहते हैं, उस दिन कई प्रकार से दीन को पूर्ण कर दिया गया। एक. हज फ़र्ज़ होने के बाद पूर्ण इस्लामी वातावरण में मुसलमानों ने इससे पहले कभी हज अदा नहीं किया था। अधिकांश आलिमों ने यही मत व्यक्त किया है। दो. अल्लाह तआला ने हज को (इस दिन) इब्राहीमी आधार पर वापस लौटा दिया और शिर्क तथा मुश्रिकों को अलग कर दिया। इसके बाद अरफ़ा के उस स्थान पर उनमें से कोई भी मुसलमानों के साथ सम्मिलित नहीं हुआ। और नेमत की पूर्णता अल्लाह की क्षमा और माफ़ी प्राप्त होने के माध्यम से हुई। क्योंकि अल्लाह की क्षमा के बिना नेमत पूर्ण नहीं होती। इसका उदाहरण यह है कि अल्लाह तआला अपने नबी से कहते हैं,

لِيَغْفِرَ لَكَ اللَّهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِكَ وَمَا تَأَخَّرَ وَيُتِمَّ نِعْمَتَهُ عَلَيْكَ وَيَهْدِيَكَ صِرَاطًا مُسْتَقِيمًا

‘ताकि अल्लाह आपकी पिछली और अगली त्रुटियों को क्षमा कर दें और आप पर अपनी नेमत पूर्ण कर दें तथा आपको सीधा मार्ग दिखाएँ (फ़त्ह : 2)’। लताइफ़े मआरिफ़ : 486।

[5]. सहीहुत-तरगीब वत-तरहीब : 1151।

[6]. अब्दुर रज़्ज़ाक़, मुसन्नफ़ : 8830।

[7]. तिर्मिज़ी : 2837; मुवत्ता मालिक : 1/422।

[8]. मुस्लिम : 1163।

[9]. मुस्लिम : 1123; मुस्नद अहमद : 2/304।

[10]. मुस्नद अहमद : 2/304।