१. मुज़दलिफ़ा में वुक़ूफ़ करना वाजिब है। अल्लाह तआला फ़रमाते हैं,
﴿فَإِذَآ أَفَضۡتُم مِّنۡ عَرَفَٰتٖ فَٱذۡكُرُواْ ٱللَّهَ عِندَ ٱلۡمَشۡعَرِ ٱلۡحَرَامِۖ وَٱذۡكُرُوهُ كَمَا هَدَىٰكُمۡ وَإِن كُنتُم مِّن قَبۡلِهِۦ لَمِنَ ٱلضَّآلِّينَ ١٩٨ ﴾ [البقرة: ١٩٨]
‘जब तुम अरफ़ात से लौटो, तो मशअरुल हराम के निकट पहुँचकर अल्लाह को याद करो और उन्हें ठीक उसी प्रकार याद करो, जैसा उन्होंने तुम्हें निर्देश दिया है। यद्यपि इससे पहले तुम भटके हुए लोगों में से थे।’[1]
२. इमाम अबू हनीफ़ा रह. ने कहा है कि मूलतः फ़ज्र से मुज़दलिफ़ा में वुक़ूफ़ का समय शुरू होता है। उनके मतानुसार मुज़दलिफ़ा में रात बिताना सुन्नत है और फ़ज्र के बाद वहाँ ठहरना वाजिब है। यदि कोई व्यक्ति बिना किसी उज़्र के फ़ज्र से पहले मुज़दलिफ़ा छोड़ दे, तो उस पर दम (जानवर ज़बह करना) वाजिब होगा। क़ुरआनुल करीम के आदेश तथा मुज़दलिफ़ा में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और सहाबा-ए-किराम के अमल को देखते हुए इमाम अबू हनीफ़ा रह. का मत यहाँ सबसे अधिक सही मत प्रतीत होता है।’[2]
३. कमज़ोर व्यक्ति और उसकी देखभाल करने वाले, महिला और उसके महरम तथा हज से संबंधित ज़िम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति के लिए आधी रात के बाद चाँद डूब जाने पर मुज़दलिफ़ा छोड़ने की अनुमति है। क्योंकि,
क. इब्न अब्बास रा. कहते हैं, ‘रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे कमज़ोर लोगों के साथ रात ही में मुज़दलिफ़ा से रवाना कर दिया।’[3]
ख. इब्न उमर रा. अपने परिवार के कमज़ोर लोगों को पहले ले जाते थे। रात के समय वे मुज़दलिफ़ा में मशअरुल हराम के निकट वुक़ूफ़ करते थे। वहाँ वे अपनी इच्छानुसार अल्लाह का ज़िक्र करते थे। फिर इमाम के वुक़ूफ़ और प्रस्थान से पहले ही वे मुज़दलिफ़ा छोड़ देते थे। उनमें से कुछ फ़ज्र की नमाज़ के समय मीना पहुँचते थे और कुछ उसके बाद पहुँचते थे। मीना पहुँचकर वे कंकड़ मारते थे। इब्न उमर रा. कहते थे, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इन लोगों को इसकी अनुमति दी है।’[4]
ग. अस्मा रा. के आज़ाद किए हुए दास अब्दुल्लाह रह. अस्मा रा. से रिवायत करते हैं कि अस्मा रा. रात के समय मुज़दलिफ़ा में ठहरीं। फिर वह नमाज़ के लिए खड़ी हो गईं। इसके बाद उन्होंने कहा, ‘बेटे, क्या चाँद डूब गया है?’ मैंने कहा, नहीं। फिर एक घंटा और नमाज़ पढ़ने के बाद उन्होंने दोबारा पूछा, ‘बेटे, क्या चाँद डूब गया है?’ मैंने उत्तर दिया, हाँ। तब उन्होंने कहा, चलो। फिर हम रवाना हुए। इसके बाद उन्होंने जमरा पर कंकड़ मारे और अपने निवास-स्थान पर पहुँचकर फ़ज्र की नमाज़ अदा की। तब मैंने कहा, ‘ऐ अमुक, हम तो बहुत तड़के निकल आए हैं।’ उन्होंने कहा, ‘बेटे, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने महिलाओं को इस मामले में अनुमति दी है।’[5]
[1]. सूरा अल-बक़रा : १९८।
[2]. इमाम शाफ़ेई रह. और इमाम अहमद इब्न हंबल रह. के मतानुसार आधी रात तक वुक़ूफ़ करना वाजिब है। आधी रात से पहले मुज़दलिफ़ा छोड़ने पर दम वाजिब होगा। इमाम मालिक रह. के मतानुसार मग़रिब और इशा की नमाज़ अदा करने में जितना समय लगता है, उतनी देर मुज़दलिफ़ा में ठहरने से ही वुक़ूफ़ हो जाएगा। ख़ालिसुल जुमान : पृ. २१४।
[3]. बुख़ारी : १६७८, मुस्लिम : १२९४।
[4]. बुख़ारी : १५६४।
[5]. बुख़ारी : १६७९, मुस्लिम : १२९१।