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हज गाइड

९ ज़िलहज

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मुज़दलिफ़ा में रात बिताना

4 मिनट में पढ़ेंआखिरी अपडेट 10 सितंबर 2026

मुज़दलिफ़ा में ठहरने की फ़ज़ीलत

मुज़दलिफ़ा में ठहरने वालों पर अल्लाह तआला कृपा करते हैं। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,

«إِنَّ اللهَ تَطَوَّلَ عَلَيْكُمْ فِي جَمْعِكُمْ هَذَا، فَوَهَبَ مُسِيئَكُمْ، لِمُحْسِنِكُمْ، وَأَعْطَى مُحْسِنَكُمْ مَا سَأَلَ».

‘अल्लाह तआला ने तुम्हारे इस (मुज़दलिफ़ा के) समागम में तुम पर कृपा की है, इसलिए उन्होंने गुनाहगारों को नेक लोगों के सुपुर्द कर दिया है। और नेक लोगों ने जो माँगा, वह उन्हें प्रदान किया है।’[1]

मुज़दलिफ़ा की ओर प्रस्थान

१. ज़िलहज्ज की ९ तारीख़ को सूर्यास्त के कुछ समय बाद हाजी साहब धीरे-धीरे और शांति के साथ अरफ़ा से मुज़दलिफ़ा की ओर प्रस्थान करेंगे। हाजियों को कष्ट देने से बचेंगे। चीख़-पुकार और बहुत तेज़ चलने से परहेज़ करेंगे। इब्न अब्बास रा. कहते हैं, ‘वह अरफ़ा के दिन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ अरफ़ा से मुज़दलिफ़ा गए थे। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने पीछे ऊँट हाँकने की डाँट-फटकार और चीख़-पुकार की आवाज़ सुनी। तब उन्होंने अपनी छड़ी से लोगों की ओर इशारा करते हुए फ़रमाया,

«أَيُّهَا النَّاسُ عَلَيْكُمْ بِالسَّكِينَةِ ، فَإِنَّ الْبِرَّ لَيْسَ بِالإِيضَاعِ»

‘ऐ लोगो! तुम्हें शांति के साथ चलना चाहिए, क्योंकि तेज़ चलने में कोई भलाई नहीं है।’[2]

२. रास्ते में जगह मिल जाए तो तेज़ गति से चलने में कोई हर्ज नहीं है। उरवा रह. कहते हैं, ‘उसामा रा. से पूछा गया, ‘विदाई हज में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम किस प्रकार रास्ता तय कर रहे थे?’ उन्होंने कहा, ‘रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मध्यम गति से रास्ता तय कर रहे थे और जब उन्हें जगह मिलती तो तेज़ गति से चलते थे।’[3]

३. मग़रिब की नमाज़ अरफ़ा के मैदान में अथवा मुज़दलिफ़ा की सीमा में प्रवेश करने से पहले कहीं भी अदा न करें।

४. अरफ़ा की सीमा पार करने के बाद लगभग ६ कि.मी. रास्ता तय करने पर मुज़दलिफ़ा की सीमा शुरू होती है। मुज़दलिफ़ा की शुरुआत और अंत दर्शाने वाले बोर्ड लगे हुए हैं। बोर्ड देखकर सुनिश्चित कर लें कि आपने मुज़दलिफ़ा में प्रवेश कर लिया है या नहीं। इसके अतिरिक्त बड़े-बड़े लाइट-पोस्टों द्वारा भी मुज़दलिफ़ा को चिह्नित किया गया है। उन्हें देखकर भी सुनिश्चित हो सकते हैं।

मुज़दलिफ़ा में किए जाने वाले कार्य

१. मुज़दलिफ़ा पहुँचने के बाद इशा के समय में विलंब किए बिना मग़रिब और इशा एक साथ अदा करेंगे। मग़रिब और इशा दोनों को एक अज़ान और दो इक़ामत के साथ अदा करना होगा। जाबिर रा. कहते हैं,

«حَتَّى أَتَى الْمُزْدَلِفَةَ فَصَلَّى بِهَا الْمَغْرِبَ وَالْعِشَاءَ بِأَذَانٍ وَاحِدٍ وَإِقَامَتَيْنِ وَلَمْ يُسَبِّحْ بَيْنَهُمَا شَيْئًا ثُمَّ اضْطَجَعَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حَتَّى طَلَعَ الْفَجْرُ»

‘नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मुज़दलिफ़ा आए। वहाँ उन्होंने मग़रिब और इशा एक अज़ान और दो इक़ामत के साथ अदा कीं। इन दोनों नमाज़ों के बीच कोई तस्बीह (सुन्नत या नफ़्ल नमाज़) नहीं पढ़ी। इसके बाद वह लेट गए। फ़ज्र (सुब्हे सादिक़) होने तक वह लेटे रहे।’[4]

अज़ान देने के बाद इक़ामत कहकर पहले मग़रिब की तीन रकअत नमाज़ अदा करनी होगी। इसके बाद सुन्नत-नफ़्ल पढ़े बिना इशा की नमाज़ की इक़ामत कहकर इशा की दो रकअत क़सर नमाज़ अदा करनी होगी। फ़र्ज़ नमाज़ अदा करने के बाद वित्र की नमाज़ भी अदा करनी होगी, क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सफ़र और मुक़ीम, किसी भी अवस्था में यह नमाज़ नहीं छोड़ते थे।

२. नमाज़ अदा करने के बाद विलंब किए बिना आराम करें और लेट जाएँ। क्योंकि उपर्युक्त हदीस से ज्ञात होता है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुज़दलिफ़ा में सुब्हे सादिक़ तक लेटकर आराम किया। चूँकि १० ज़िलहज्ज को हाजी साहब को बहुत परिश्रम करना होगा, इसलिए नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुज़दलिफ़ा की रात में आराम करने का विधान रखा है। अतः हाजियों के लिए मुज़दलिफ़ा की रात जागकर इबादत-बंदगी करना रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत के विरुद्ध है।

३. मुज़दलिफ़ा पहुँचने पर यदि इशा की नमाज़ का समय न हुआ हो तो प्रतीक्षा करनी होगी। हदीस में उल्लेख हुआ है,

«إِنَّ هَاتَيْنِ الصَّلاَتَيْنِ حُوِّلَتَا عَنْ وَقْتِهِمَا فِى هَذَا الْمَكَانِ الْمَغْرِبَ وَالْعِشَاءَ»

‘इस स्थान (मुज़दलिफ़ा) में इन दोनों नमाज़ों, मग़रिब और इशा, को उनके समय से परिवर्तित कर दिया गया है।’[5]

४. सुन्नत यह है कि सुब्हे सादिक़ होने पर अव्वल वक़्त में फ़ज्र की नमाज़ अदा करके क़िबले की ओर मुँह करके हाथ उठाकर दुआ की जाए। आकाश उजला होने तक दुआ और ज़िक्र में व्यस्त रहें। आकाश उजला होने के बाद सूर्योदय से पहले ही मिना की ओर प्रस्थान करें। जाबिर रा. से वर्णित हदीस में उल्लेख हुआ है,

«فَلَمْ يَزَلْ وَاقِفًا حَتَّى أَسْفَرَ جِدًّا فَدَفَعَ قَبْلَ أَنْ تَطْلُعَ الشَّمْسُ»

‘आकाश अच्छी तरह उजला होने तक रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वुक़ूफ़ (ठहराव) किया। इसके बाद सूर्योदय से पहले उन्होंने (मुज़दलिफ़ा से मिना की ओर) यात्रा आरंभ की।’[6]

इसलिए प्रत्येक हाजी साहब को चाहिए कि जिस प्रकार रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुज़दलिफ़ा में रात बिताई और फ़ज्र के बाद वुक़ूफ़ किया, ठीक उसी प्रकार रात बिताएँ और वुक़ूफ़ करें।

५. रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़ज्र की नमाज़ अदा करने के बाद ‘क़ुज़ह’ पहाड़ के दामन में जाकर वुक़ूफ़ किया। वर्तमान में इस पहाड़ के पास मशअरुल हराम मस्जिद स्थित है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,

«وَقَفْتُ هَاهُنَا وَجَمْعٌ كُلُّهَا مَوْقِفٌ»

‘मैंने यहाँ वुक़ूफ़ किया है, किंतु पूरा मुज़दलिफ़ा ही वुक़ूफ़ का स्थान है।’[7]

इसलिए संभव हो तो उक्त मस्जिद के पास जाकर वुक़ूफ़ करना अच्छा है। यदि संभव न हो तो आप जिस स्थान पर हैं, वह मुज़दलिफ़ा की सीमा के भीतर है या नहीं, यह देख लें और वहीं ठहरें।’

[1]. इब्न माजाह : ३०२३।

[2]. बुख़ारी : १६७१।

[3]. पूर्वोक्त।

[4]. मुस्लिम १२१८।

[5]. बुख़ारी : १६८३।

[6]. मुस्लिम : १२१८।

[7]. मुस्लिम : १२१८।