हज और उमरा की फ़ज़ीलत
हज और उमरा की फ़ज़ीलत के बारे में बहुत-सी हदीसें हैं। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:
1. हज सर्वश्रेष्ठ कर्मों में से एक है। अबू हुरैरा रज़ि. से वर्णित है, ‘रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा गया कि कौन-सा कर्म सर्वश्रेष्ठ है?’
«فَقَالَ إِيمَانٌ بِاللهِ وَرَسُولِهِ قِيلَ ثُمَّ مَاذَا قَالَ الْجِهَادُ فِي سَبِيلِ اللهِ قِيلَ ثُمَّ مَاذَا قَالَ حَجٌّ مَبْرُور».
उन्होंने कहा, ‘अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाना।’ पूछा गया, ‘फिर क्या?’ उन्होंने कहा, ‘अल्लाह के मार्ग में जिहाद करना।’ पूछा गया, ‘फिर कौन-सा?’ उन्होंने कहा, ‘क़बूल हज।’[1] एक अन्य हदीस में वर्णित है कि एक व्यक्ति ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा कि सर्वश्रेष्ठ कर्म क्या है। उत्तर में उन्होंने कहा,
«الإِيمَانُ بِاللَّهِ وَحْدَهُ، ثُمَّ الْجِهَادُ، ثُمَّ حَجَّةٌ بَرَّةٌ تَفْضُلُ سَائِرَ الْعَمَلِ كَمَا بَيْنَ مَطْلِعِ الشَّمْسِ إِلَى مَغْرِبِهَا».
‘एक अल्लाह पर ईमान लाना; फिर हज्जे-मबरूर, जो सभी कर्मों से श्रेष्ठ है; उसका अन्य कर्मों पर श्रेष्ठता का अंतर वैसा ही है, जैसा सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच का अंतर।’[2]
2. पाप-मुक्त हज का प्रतिफल जन्नत है। अबू हुरैरा रज़ि. से वर्णित है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा,
«وَالْحَجُّ الْمَبْرُورُ لَيْسَ لَهُ جَزَاءٌ إِلاَّ الْجَنَّةُ».
‘और हज्जे-मबरूर का प्रतिफल जन्नत के सिवा कुछ नहीं।’[3]
3. रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज को जिहाद माना है। आयशा रज़ि. से वर्णित है, उन्होंने कहा, ‘ऐ अल्लाह के रसूल! जिहाद को सर्वश्रेष्ठ कर्म माना जाता है, तो क्या हम जिहाद न करें?’ उन्होंने कहा,
«لَكُنَّ أَفْضَلَ الْجِهَادِ حَجٌّ مَبْرُورٌ».
‘तुम्हारे लिए सर्वश्रेष्ठ जिहाद हज्जे-मबरूर है।’[4] एक अन्य हदीस में वर्णित है कि आयशा रज़ि. ने कहा, ‘या रसूलल्लाह! क्या हम आपके साथ जिहाद और सैन्य अभियानों में न जाएँ?’ उन्होंने कहा,
«لَكُنَّ أَحْسَنُ الْجِهَادِ وَأَجْمَلُهُ الْحَجُّ حَجٌّ مَبْرُورٌ».
‘तुम्हारे लिए उत्तम और सबसे सुंदर जिहाद ‘हज’—हज्जे-मबरूर है।’[5] अबू हुरैरा रज़ि. से वर्णित है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा,
«جِهَادُ الْكَبِيرِ ، وَالصَّغِيرِ ، وَالضَّعِيفِ ، وَالْمَرْأَةِ : الْحَجُّ ، وَالْعُمْرَةُ».
‘वृद्ध, नाबालिग, कमज़ोर और महिला का जिहाद हज और उमरा है।’[6]
4. हज पापों को मिटा देता है। अबू हुरैरा रज़ि. से वर्णित है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा,
«مَنْ حَجَّ لِلَّهِ فَلَمْ يَرْفُثْ وَلَمْ يَفْسُقْ رَجَعَ كَيَوْمِ وَلَدَتْهُ أُمُّهُ».
‘जिसने अल्लाह के लिए हज किया, यौन-स्पर्श से संबंधित कार्यों और बातों से बचा तथा ऐसे कार्यों से दूर रहा जिनकी शरीअत अनुमति नहीं देती, वह उस दिन की तरह पवित्र होकर लौटा जिस दिन उसकी माँ ने उसे जन्म दिया था।’[7]
इस हदीस का अर्थ अम्र इब्नुल आस रज़ि. से वर्णित हदीस द्वारा और अधिक सुदृढ़ होता है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनसे कहा,
«أَمَا عَلِمْتَ أَنَّ الإِسْلاَمَ يَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهُ وَأَنَّ الْهِجْرَةَ تَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهَا وَأَنَّ الْحَجَّ يَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهُ».
‘क्या तुम नहीं जानते कि किसी व्यक्ति का इस्लाम स्वीकार करना उसके पिछले सभी गुनाहों को मिटा देता है, हिजरत उसके पिछले सभी गुनाहों को मिटा देती है और हज उसके पिछले सभी गुनाहों को मिटा देता है?’[8]
5. हज की तरह उमरा भी पापों को मिटाता है। अबू हुरैरा रज़ि. से वर्णित है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा,
«مَنْ أَتَى هَذَا الْبَيْتَ فَلَمْ يَرْفُثْ وَلَمْ يَفْسُقْ رَجَعَ كَمَا وَلَدَتْهُ أُمُّهُ».
‘जो व्यक्ति इस घर में आया, फिर यौन-स्पर्श से संबंधित कार्यों और बातों से बचा तथा शरीअत-विरुद्ध कार्यों से दूर रहा, वह उस दिन की तरह निष्पाप होकर लौटा जिस दिन उसकी माँ ने उसे जन्म दिया था।’ इमाम इब्न हजर अस्क़लानी के मतानुसार यहाँ हज और उमरा करने वाले दोनों व्यक्ति अभिप्रेत हैं।[9]
6. हज और उमरा पापों को मिटाने के साथ-साथ हज और उमरा करने वालों की निर्धनता भी दूर कर देते हैं। अब्दुल्लाह इब्न मसऊद रज़ि. से वर्णित है, उन्होंने कहा, ‘रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा,
«تَابِعُوا بَيْنَ الْحَجِّ وَالْعُمْرَةِ، فَإِنَّهُمَا يَنْفِيَانِ الْفَقْرَ وَالذُّنُوبَ كَمَا يَنْفِي الْكِيرُ خَبَثَ الْحَدِيدِ، وَالذَّهَبِ وَالْفِضَّةِ».
‘तुम हज और उमरा लगातार करते रहो, क्योंकि ये निर्धनता और गुनाहों को उसी तरह दूर कर देते हैं, जैसे लोहार की धौंकनी लोहे, सोने और चाँदी की मैल को दूर कर देती है।’[10]
7. हज और उमरा करने वाले अल्लाह के मेहमान या प्रतिनिधि हैं। इब्न उमर रज़ि. से वर्णित है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा,
«الْغَازِي فِي سَبِيلِ اللهِ ، وَالْحَاجُّ وَالْمُعْتَمِرُ ، وَفْدُ اللهِ ، دَعَاهُمْ ، فَأَجَابُوهُ ، وَسَأَلُوهُ ، فَأَعْطَاهُمْ».
‘अल्लाह के मार्ग में युद्ध करने वाला विजयी योद्धा, हज करने वाला और उमरा करने वाला अल्लाह के मेहमान या प्रतिनिधि हैं। अल्लाह ने उन्हें बुलाया और उन्होंने उसकी पुकार स्वीकार की। उन्होंने उससे माँगा और उसने उन्हें प्रदान किया।’[11] एक अन्य हदीस में अबू हुरैरा रज़ि. से वर्णित है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा,
«الْحُجَّاجُ وَالْعُمَّارُ ، وَفْدُ اللهِ إِنْ دَعَوْهُ أَجَابَهُمْ ، وَإِنِ اسْتَغْفَرُوهُ غَفَرَ لَهُمْ».
‘हज और उमरा करने वाले अल्लाह के मेहमान या प्रतिनिधि हैं। जब वे अल्लाह को पुकारते हैं तो वह उनकी पुकार स्वीकार करता है। जब वे उससे मग़फ़िरत माँगते हैं तो वह उन्हें क्षमा कर देता है।’[12]
8. एक उमरे से दूसरे उमरे तक के बीच होने वाले गुनाहों और पापों का कफ़्फ़ारा हो जाता है। अबू हुरैरा रज़ि. से वर्णित है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा,
«الْعُمْرَةُ إِلَى الْعُمْرَةِ كَفَّارَةٌ لِمَا بَيْنَهُمَا».
‘एक उमरे से दूसरे उमरे तक—इन दोनों के बीच जो कुछ पाप होंगे, वह उनका कफ़्फ़ारा है।’[13]
9. हज की नीयत से निकलकर मृत्यु हो जाने पर भी हज का सवाब मिलता रहेगा। अबू हुरैरा रज़ि. से वर्णित है, उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा,
«مَنْ خَرَجَ حَاجًّا فَمَاتَ كُتِبَ لَهُ أَجْرُ الْحَاجِّ إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ وَمَنْ خَرَجَ مُعْتَمِرًا فَمَاتَ كُتِبَ لَهُ أَجْرُ الْمُعْتَمِرِ إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ».
‘जो व्यक्ति हज के उद्देश्य से निकला और फिर उसकी मृत्यु हो गई, उसके लिए क़ियामत तक हज की नेकियाँ लिखी जाती रहेंगी। और जो व्यक्ति उमरे के उद्देश्य से निकला और उसकी मृत्यु हो गई, उसके लिए क़ियामत तक उमरे की नेकियाँ लिखी जाती रहेंगी।’[14]
10. अल्लाह तआला ने रमज़ान के महीने में उमरा करने को बहुत प्रतिष्ठित बनाया है और उसे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ हज करने के समान सवाब प्रदान किया है। इब्न अब्बास रज़ि. से वर्णित है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा,
«فَإِنَّ عُمْرَةً فِي رَمَضَانَ تَقْضِي حَجَّةً أَوْ حَجَّةً مَعِي».
‘निस्संदेह रमज़ान में उमरा करना हज करने के समान है’, अथवा उन्होंने कहा, ‘मेरे साथ हज करने के समान है।’[15]
11. बैतुल्लाह के उद्देश्य से निकलने पर प्रत्येक कदम के बदले नेकी लिखी जाती है, गुनाह क्षमा किया जाता है और दर्जा ऊँचा किया जाता है। अब्दुल्लाह इब्न उमर रज़ि. से वर्णित है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा,
«أَمَّا خُرُوجُكَ مِنْ بَيْتِكَ تَؤُمُّ الْبَيْتَ فَإِنَّ لَكَ بِكُلِّ وَطْأَةٍ تَطَأُهَا رَاحِلَتُكَ يَكْتُبُ اللَّهُ لَكَ بِهَا حَسَنَةً وَيَمْحُو عَنْكَ بِهَا سَيِّئَةً».
‘जब तुम बैतुल्लाह के उद्देश्य से अपने घर से निकलोगे, तो तुम्हारी सवारी के हर बार भूमि पर पैर रखने और पैर उठाने के बदले तुम्हारे लिए एक नेकी लिखी जाएगी और तुम्हारा एक गुनाह क्षमा किया जाएगा।’[16]
अनस इब्न मालिक रज़ि. से वर्णित है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा,
«فَإِنَّكَ إِذَا خَرَجْتَ مِنْ بَيْتِكَ تَؤُمُّ الْبَيْتَ الْحَرَامِ ، لا تَضَعُ نَاقَتُكَ خُفًّا وَلا تَرْفَعُهُ إِلَّا كَتَبَ اللَّهُ لَكَ بِهِ حَسَنَةً ، وَحَطَّ عَنْكَ بِهِ خَطِيئَةً ، وَرَفَعَكَ دَرَجَةً»
‘क्योंकि जब तुम बैतुल्लाह के उद्देश्य से अपने घर से निकलोगे, तो तुम्हारी ऊँटनी के हर बार खुर रखने और खुर उठाने के साथ तुम्हारे लिए एक नेकी लिखी जाएगी, तुम्हारा एक गुनाह क्षमा किया जाएगा और तुम्हारा दर्जा ऊँचा किया जाएगा।’[17]
यह याद रखना चाहिए कि जो केवल अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए कर्म करेगा और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत के अनुसार हज और उमरा पूरा करेगा, वही इन फ़ज़ीलतों को प्राप्त करेगा। किसी भी कर्म के अल्लाह के यहाँ क़बूल होने के लिए दो शर्तें हैं, जिन्हें अवश्य पूरा करना होगा।
पहली शर्त: केवल अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए करना। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा,
«إِنَّمَا الأَعْمَالُ بِالنِّيَّاتِ، وَإِنَّمَا لِكُلِّ امْرِئٍ مَا نَوَى»
‘सभी कर्मों का फल नीयत पर निर्भर है। प्रत्येक व्यक्ति को वही मिलेगा जिसकी उसने नीयत की होगी।’[18]
दूसरी शर्त: रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत के अनुसार होना। क्योंकि उन्होंने कहा,
«مَنْ عَمِلَ عَمَلاً لَيْسَ عَلَيْهِ أَمْرُنَا فَهْوَ رَدٌّ».
‘जिसने ऐसा कर्म किया जिस पर हमारी स्वीकृति नहीं है, वह अस्वीकृत है।’[19]
अतः जिसका कर्म केवल अल्लाह को प्रसन्न करने के लिए और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत के अनुसार होगा, उसी का कर्म अल्लाह के यहाँ क़बूल होगा। इसके विपरीत, जिसके कर्म में दोनों शर्तें अथवा इनमें से कोई एक शर्त अनुपस्थित होगी, उसका कर्म अस्वीकृत होगा। उनके कर्मों के बारे में अल्लाह कहता है,
﴿ وَقَدِمۡنَآ إِلَىٰ مَا عَمِلُواْ مِنۡ عَمَلٖ فَجَعَلۡنَٰهُ هَبَآءٗ مَّنثُورًا ٢٣ ﴾ [الفرقان: ٢٢]
‘और उन्होंने जो कर्म किए हैं, हम उनकी ओर बढ़ेंगे, फिर उन्हें बिखरे हुए धूल-कणों में बदल देंगे।’[20]
इसके विपरीत, जिसके कर्म में दोनों शर्तें पूरी होंगी, उसके कर्म के बारे में अल्लाह कहता है,
﴿ وَمَنۡ أَحۡسَنُ قَوۡلٗا مِّمَّن دَعَآ إِلَى ٱللَّهِ وَعَمِلَ صَٰلِحٗا وَقَالَ إِنَّنِي مِنَ ٱلۡمُسۡلِمِينَ ٣٣ ﴾ [فصلت: ٣٣]
‘और दीन के मामले में उससे बेहतर कौन है, जिसने सदाचारी होते हुए स्वयं को पूर्णतः अल्लाह के हवाले कर दिया।’[21] अल्लाह आगे कहता है,
﴿ بَلَىٰۚ مَنۡ أَسۡلَمَ وَجۡهَهُۥ لِلَّهِ وَهُوَ مُحۡسِنٞ فَلَهُۥٓ أَجۡرُهُۥ عِندَ رَبِّهِۦ وَلَا خَوۡفٌ عَلَيۡهِمۡ وَلَا هُمۡ يَحۡزَنُونَ ١١٢ ﴾ [البقرة: ١١٢]
‘हाँ, जिसने स्वयं को अल्लाह के हवाले कर दिया और वह सदाचारी भी है, तो उसके लिए उसके रब के पास उसका प्रतिफल है। और उन्हें न कोई भय होगा और न वे दुखी होंगे।’[22]
अतः उमर रज़ि. द्वारा वर्णित हदीस, ‘सभी कर्मों का फल नीयत पर निर्भर है’, दिल के कर्मों की कसौटी है; और आयशा रज़ि. द्वारा वर्णित हदीस, ‘जिसने ऐसा कर्म किया जिस पर मेरी स्वीकृति नहीं है, वह अस्वीकृत है’, अंग-प्रत्यंग के कर्मों की कसौटी है। दोनों हदीसें व्यापक अर्थ रखती हैं। दीन के मूल विषयों और उसकी शाखाओं तथा दिल एवं अंग-प्रत्यंग के कर्मों में से कोई भी इनके दायरे से बाहर नहीं है। संक्षेप में, संपूर्ण दीन इनके अंतर्गत आता है।
[1]. बुख़ारी: 62; मुस्लिम: 38।
[2]. अहमद: 4/342।
[3]. बुख़ारी: 3771; मुस्लिम: 9431।
[4]. बुख़ारी: 4872।
[5]. फ़त्हुल बारी: 4/1861।
[6]. नसाई: 2/557।
[7]. बुख़ारी: 1521; मुस्लिम: 1350।
[8]. मुस्लिम: 121।
[9]. फ़त्हुल बारी: 3/382।
[10]. तिर्मिज़ी: 810।
[11]. इब्न माजह: 2893; इब्न हिब्बान: 3400; मुस्नदे अहमद: 1489।
[12]. इब्न माजह: 2883।
[13]. बुख़ारी: 1773; मुस्लिम: 1394।
[14]. सहीहुत-तरग़ीब वत-तरहीब: 1114।
[15]. बुख़ारी: 1863; मुस्लिम: 1256।
[16]. तबरानी, मुअजमुल कबीर: 11/55।
[17]. सहीहुत-तरग़ीब वत-तरहीब: 1112।
[18]. बुख़ारी: 1/9; मुस्लिम: 3/1515।
[19]. मुस्लिम: 3/344।
[20]. फ़ुरक़ान: 23।
[21]. निसा: 125।
[22]. बक़रा: 112।
हज, उमरा और ज़ियारत
प्रथम अध्याय: हज और उमरा क्या हैं, क्यों और कब
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