दुआएं
सुबह और शाम
8 दुआएं
- 1
आयतुल कुर्सी
اَللّٰهُ لَآ اِلٰهَ اِلَّا ھُوَ ۚ اَلْـحَيُّ الْقَيُّوْمُ ڬ لَا تَاْخُذُهٗ سِـنَةٌ وَّلَا نَوْمٌ ۭ لَهٗ مَا فِي السَّمٰوٰتِ وَمَا فِي الْاَرْضِ ۭ مَنْ ذَا الَّذِيْ يَشْفَعُ عِنْدَهٗٓ اِلَّا بِاِذْنِهٖ ۭ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ اَيْدِيْهِمْ وَمَا خَلْفَھُمْ ۚ وَلَا يُحِيْطُوْنَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهٖٓ اِلَّا بِمَا شَاۗءَ ۚ وَسِعَ كُرْسِـيُّهُ السَّمٰوٰتِ وَالْاَرْضَ ۚ وَلَا يَـــــُٔـــوْدُهٗ حِفْظُهُمَا ۚ وَھُوَ الْعَلِيُّ الْعَظِيْمُ
सुबह और शाम को पढ़ेगा।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 2
सूरा इख़लास, सूरा अल-फ़लक़ और सूरा अन-नास
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ ﴿قُلْ هُوَ اللّٰهُ اَحَدٌ ۚ اَللّٰهُ الصَّمَدُ ۚ لَمْ يَلِدْ ڏ وَلَمْ يُوْلَدْ وَلَمْ يَكُنْ لَّهٗ كُفُوًا اَحَدٌ بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ ﴿قُلْ اَعُوْذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ وَمِنْ شَرِّ غَاسِقٍ اِذَا وَقَبَ وَمِنْ شَرِّ النَّفّٰثٰتِ فِي الْعُقَدِ وَمِنْ شَرِّ حَاسِدٍ اِذَا حَسَدَ ﴾ بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ ﴿قُلْ اَعُوْذُ بِرَبِّ النَّاسِ مَلِكِ النَّاسِ اِلٰهِ النَّاسِ مِنْ شَرِّ الْوَسْوَاسِ ڏ الْخَنَّاسِ الَّذِيْ يُوَسْوِسُ فِيْ صُدُوْرِ النَّاسِ مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ ۧ﴾
सुबह और शाम सूरह अल-इख़लास, सूरह अल-फ़लक़ और सूरह अन-नास (तीन-तीन बार पढ़ें)
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 3
सुबह की दुआ - १
أَصْبَحْنَا وَأَصْبَحَ الْمُلْكُ لِلَّهِ، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ، لاَ إِلَهَ إلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، رَبِّ أَسْأَلُكَ خَيْرَ مَا فِي هَذَا الْيَوْمِ وَخَيرَ مَا بَعْدَهُ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا فِي هَذَا الْيَوْمِ وَشَرِّ مَا بَعْدَهُ، رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْكَسَلِ وَسُوءِ الْكِبَرِ، رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابٍ فِي النَّارِ وَعَذَابٍ فِي الْقَبْرِ
हमने सुबह की और समस्त राज्य ने भी सुबह की, अल्लाह ही के लिए। समस्त प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है। एकमात्र अल्लाह के सिवा कोई सत्य उपास्य नहीं, उसका कोई साझी नहीं। राज्य उसी का है और प्रशंसा भी उसी की है, और वह हर चीज़ पर सामर्थ्यवान है। ऐ रब! मैं आपसे इस दिन की और इसके बाद की समस्त भलाई माँगता हूँ। और मैं इस दिन की और इसके बाद की समस्त बुराई से आपकी शरण चाहता हूँ। ऐ रब! मैं आलस्य और बुरे बुढ़ापे से आपकी शरण चाहता हूँ। ऐ रब! मैं जहन्नम की यातना और क़ब्र की यातना से आपकी शरण चाहता हूँ।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 4
शाम की दुआ - 1
أَصْبَحْنَا وَأَصْبَحَ الْمُلْكُ لِلَّهِ، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ، لاَ إِلَهَ إلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، رَبِّ أَسْأَلُكَ خَيْرَ مَا فِيْ هَذِهِ اللَّيْلَةِ وَخَيْرَ مَا بَعْدَهَا، وَأَعُوْذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا فِيْ هَذِهِ اللَّيْلَةِ، وَشَرِّ مَا بَعْدَهَا، رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْكَسَلِ وَسُوءِ الْكِبَرِ، رَبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابٍ فِي النَّارِ وَعَذَابٍ فِي الْقَبْرِ
हमने सुबह की और समस्त राज्य ने भी सुबह की, अल्लाह के लिए। समस्त प्रशंसा अल्लाह के लिए है। एकमात्र अल्लाह के सिवा कोई सत्य उपास्य नहीं, उसका कोई साझी नहीं। राज्य उसी का है और प्रशंसा भी उसी के लिए है, और वह हर चीज़ पर सामर्थ्यवान है। ऐ रब! मैं आपसे इस रात में और इसके बाद जो भलाई है, उसकी प्रार्थना करता हूँ। और इस रात में तथा इसके बाद जो बुराई है, उससे आपकी शरण माँगता हूँ। ऐ रब! मैं आलस्य और बुरे बुढ़ापे से आपकी शरण माँगता हूँ। ऐ रब! मैं जहन्नम की यातना और क़ब्र की यातना से आपकी शरण माँगता हूँ।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 5
सुबह की दुआ - २
للَّهُمَّ بِكَ أَصْبَحْنَا، وَبِكَ أَمْسَيْنَا، وَبِكَ نَحْيَا، وَبِكَ نَمُوتُ وَإِلَيْكَ النُّشُورُ
ऐ अल्लाह! हमने आपके लिए सुबह की है और आपके ही लिए हमने शाम की है। और आपके द्वारा ही हम जीवित रहते हैं, आपके द्वारा ही हम मरेंगे; और आपकी ही ओर उठाए जाएँगे।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 6
शाम की दुआ - २
اَللَّهُمَّ بِكَ أَمْسَيْنَا، وَبِكَ أَصْبَحْنَا، وَبِكَ نَحْيَا، وَبِكَ نَمُوْتُ، وَإِلَيْكَ الْمَصِيْرُ
ऐ अल्लाह! हमने आपके लिए शाम पाई है और आपके ही लिए हमने सुबह पाई है। और आपके द्वारा ही हम जीवित रहते हैं, आपके द्वारा ही हम मरेंगे; और आपकी ही ओर लौटकर जाना है।’
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 7
सय्यिदुल इस्तिग़फ़ार
للَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لَا إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ، خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ، وَأَنَا عَلَى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ، أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ، وَأَبُوءُ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لاَ يَغْفِرُ الذُّنوبَ إِلاَّ أَنْتَ
ऐ अल्लाह! आप मेरे रब हैं, आपके सिवा कोई सच्चा इलाह नहीं है। आपने मुझे पैदा किया है और मैं आपका बंदा हूँ। और मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार आपसे की गई (तौहीद की) प्रतिज्ञा और आपके (जन्नत के) वादे पर कायम हूँ। मैं अपने किए हुए कर्मों की बुराई से आपकी पनाह चाहता हूँ। आपने मुझे जो नेमतें दी हैं, मैं उन्हें स्वीकार करता हूँ और मैं अपने गुनाहों को भी स्वीकार करता हूँ। अतः आप मुझे माफ़ कर दें। निश्चय ही आपके सिवा कोई भी गुनाहों को माफ़ नहीं करता।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 8
सुबह-शाम की दुआ
رَضِيتُ بِاللَّهِ رَبَّاً، وَبِالْإِسْلاَمِ دِيناً، وَبِمُحَمَّدٍ ﷺ نَبِيّاً
अल्लाह को रब, इस्लाम को दीन और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को नबी के रूप में स्वीकार करके मैं संतुष्ट हूँ। जो व्यक्ति यह दुआ सुबह और शाम तीन बार कहेगा, अल्लाह के पास उसका यह अधिकार हो जाता है कि वह क़ियामत के दिन उसे संतुष्ट करे।
संदर्भ: Hisnul Muslim