दुआएं
यात्रा
3 दुआएं
- 1
सवारी पर चढ़ने की दुआ
بِسْمِ اللَّهِ، وَالْحَمْدُ للَّهِ ﴿سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ، وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ﴾، «الْحَمْدُ لِلَّهِ، الْحَمْدُ لِلَّهِ، الْحَمْدُ لِلَّهِ، اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي فَاغْفِرْ لِي؛ فَإِنَّهُ لاَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ إِلاَّ أَنْتَ»
“अल्लाह के नाम से; और समस्त प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है। पवित्र और महान है वह सत्ता, जिसने इसे हमारे लिए वश में कर दिया, अन्यथा हम इसे वश में करने में सक्षम नहीं थे। और निश्चय ही हम अपने रब की ओर लौटने वाले हैं। समस्त प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, समस्त प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, समस्त प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है। अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है। ऐ अल्लाह! आप पवित्र और महान हैं; मैंने स्वयं पर ज़ुल्म किया है, अतः आप मुझे क्षमा कर दें। क्योंकि आपके सिवा गुनाहों को क्षमा करने वाला कोई नहीं है।”
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 2
सफ़र की दुआ
اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، اللَّهُ أَكْبَرُ، ﴿سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ * وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ﴾ «اللَّهُمَّ إِنّا نَسْأَلُكَ فِي سَفَرِنَا هَذَا البِرَّ وَالتَّقْوَى، وَمِنَ الْعَمَلِ مَا تَرْضَى، اللَّهُمَّ هَوِّنْ عَلَيْنَا سَفَرَنَا هَذَا وَاطْوِ عَنَّا بُعْدَهُ، اللَّهُمَّ أَنْتَ الصَّاحِبُ فِي السَّفَرِ، وَالْخَليفَةُ فِي الْأَهْلِ، اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ وَعْثَاءِ السَّفَرِ، وَكَآبَةِ الْمَنْظَرِ، وَسُوءِ الْمُنْقَلَبِ فِي الْمَالِ وَالْأَهْلِ» --- «آيِبُونَ، تائِبُونَ، عَابِدُونَ، لِرَبِّنَا حَامِدُونَ»
“अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है, अल्लाह सबसे बड़ा है। पवित्र और महान है वह सत्ता, जिसने इसे हमारे लिए वश में कर दिया, अन्यथा हम इसे वश में करने में सक्षम नहीं थे। और निश्चय ही हम अपने रब के पास लौटने वाले हैं। ऐ अल्लाह! हम इस यात्रा में आपसे नेकी, तक़वा और ऐसे कर्म की प्रार्थना करते हैं जिसे आप पसंद करते हैं। ऐ अल्लाह! हमारे लिए इस यात्रा को आसान कर दें और इसकी दूरी को हमारे लिए कम कर दें। ऐ अल्लाह! आप ही यात्रा में हमारे साथी और हमारे परिवार की देखभाल करने वाले हैं। ऐ अल्लाह! हम यात्रा के कष्टों, अप्रिय दृश्य और धन तथा परिवार में हानिकारक वापसी से आपकी शरण माँगते हैं।” --- (अगला अंश यात्रा से लौटते समय जोड़ना होता है) “हम लौटने वाले, तौबा करने वाले, इबादत करने वाले और अपने रब की प्रशंसा करने वाले हैं।”
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 3
सफ़र से लौटने का ज़िक्र
« لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَحْدَهُ لاَ شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ، وَلَهُ الْحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، آيِبُونَ، تَائِبُونَ، عَابِدُونَ، لِرَبِّنا حَامِدُونَ، صَدَقَ اللَّهُ وَعْدَهُ، وَنَصَرَ عَبْدَهُ، وَهَزَمَ الْأَحْزابَ وَحْدَهُ»
“एकमात्र अल्लाह के सिवा कोई सत्य उपास्य नहीं, उसका कोई शरीक नहीं; बादशाहत उसी की है और समस्त प्रशंसा भी उसी के लिए है; और वह हर चीज़ पर सामर्थ्यवान है। हम लौटने वाले, तौबा करने वाले, इबादत करने वाले और अपने रब की प्रशंसा करने वाले हैं। अल्लाह ने अपना वादा पूरा किया, अपने बंदे की सहायता की और सभी विरोधी दलों-समूहों को अकेले ही परास्त कर दिया।”
संदर्भ: Hisnul Muslim