दुआएं
नमाज़
16 दुआएं
- 1
सलात के आरंभ की दुआ - १
اَللّٰهُمَّ بَاعِدْ بَيْنِيْ وَبَيْنَ خَطَايَايَ كَمَا بَاعَدْتَ بَيْنَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ، اَللّٰهُمَّ نَقِّنِيْ مِنْ خَطَايَايَ كَمَا يُنَقَّى الثَّوْبُ الْأَبْيَضُ مِنَ الدَّنَسِ، اَللّٰهُمَّ اغْسِلْنِيْ مِنْ خَطَايَايَ بِالْمَاءِ وَالثَّلْجِ وَالْبَرَدِ
"हे अल्लाह! आप मेरे और मेरे गुनाहों के बीच ऐसी दूरी पैदा कर दें, जैसी दूरी आपने पूरब और पश्चिम के बीच पैदा की है। हे अल्लाह! आप मुझे मेरे गुनाहों से इस तरह पाक-साफ़ कर दें, जैसे सफ़ेद कपड़े को मैल से साफ़ किया जाता है। हे अल्लाह! आप मुझे मेरे पापों से बर्फ़, पानी और ओलों द्वारा धो दें।"
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 2
सलात के आरंभ में दुआ - २
سُبْحَانَكَ اللّٰهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، وَتَبَارَكَ اسْمُكَ، وَتَعَالَى جَدُّكَ، وَلَا إِلٰهَ غَيْرُكَ
ऐ अल्लाह! आपकी प्रशंसा के साथ मैं आपकी पवित्रता और महिमा का वर्णन करता हूँ। आपका नाम अत्यंत बरकत वाला है, आपकी शान बहुत ऊँची है। और आपके सिवा कोई सत्य उपास्य नहीं है।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 3
रुकू‘ की दुआ - 1
سُبْحَانَ رَبِّيَ الْعَظِيْمِ
मैं अपने महान रब की पवित्रता और महिमा का बखान करता हूँ।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 4
रुकू की दुआ - २
سُبْحَانَكَ اللّٰهُمَّ رَبَّنَا وَبِحَمْدِكَ، اَللّٰهُمَّ اغْفِرْ لِيْ
ऐ अल्लाह! हमारे रब! हम आपकी प्रशंसा के साथ आपकी पवित्रता और महिमा का बखान करते हैं। ऐ अल्लाह! आप मुझे माफ़ कर दें।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 5
रुकू से उठने की दुआ - १
سَمِعَ اللّٰهُ لِمَنْ حَمِدَهُ
जो अल्लाह की हम्द व प्रशंसा करता है, अल्लाह उसकी प्रशंसा सुनते हैं (क़बूल फ़रमाएँ)।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 6
रुकू से उठने की दुआ - २
رَبَّنَا وَلَكَ الْحَمْدُ، حَمْدًا كَثِيرًا طَيِّبًا مُبارَكًا فِيْهِ
हे हमारे रब! और समस्त प्रशंसा केवल आपके ही लिए है; अत्यधिक, पवित्र और बरकत वाली प्रशंसा।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 7
सजदे की दुआ - १
سُبْحَانَ رَبِّيَ الأَعْلَى
मैं अपने रब की पवित्रता और महिमा का वर्णन करता हूँ, जो सबसे ऊपर हैं।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 8
सजदे की दुआ - २
سُبْحَانَكَ اللّٰهُمَّ رَبَّنَا وَبِحَمْدِكَ، اَللّٰهُمَّ اغْفِرْ لِيْ
ऐ अल्लाह! हमारे रब! आपकी प्रशंसा के साथ हम आपकी पवित्रता और महिमा का वर्णन करते हैं। ऐ अल्लाह! आप मुझे माफ़ कर दें।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 9
सजदे की दुआ - ३
سُبُّوْحٌ، قُدُّوْسٌ، رَبُّ الْمَلَائِكَةِ وَالرُّوْحِ
(वह/आप) पूर्णतः दोष-त्रुटि से मुक्त, अत्यंत पवित्र एवं महिमावान हैं; फ़रिश्तों और रूह के रब।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 10
दो सज्दों के बीच बैठने की दुआ - १
رَبِّ اغْفِرْ لِيْ، رَبِّ اغْفِرْ لِيْ
ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दीजिए। ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दीजिए।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 11
दो सजदों के बीच बैठने की दुआ - २
اَللّٰهُمَّ اغْفِرْ لِيْ، وَارْحَمْنِيْ، وَاهْدِنِيْ، وَاجْبُرْنِيْ، وَعَافِنِيْ، وَارْزُقْنِيْ، وَارْفَعْنِيْ
हे अल्लाह! आप मुझे क्षमा करें, मुझ पर दया करें, मुझे सही मार्ग पर चलाएँ, मेरी समस्त क्षति की भरपाई कर दें, मुझे सुरक्षा प्रदान करें, मुझे रिज़्क़ प्रदान करें और मेरी प्रतिष्ठा बढ़ाएँ।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 12
तशह्हुद
أَلتَّحِيَّاتُ لِلّٰهِ، وَالصَّلَوَاتُ، وَالطَّيِّبَاتُ، اَلسَّلَامُ عَلَيْكَ أَيُّهَا النَّبِيُّ وَرَحْمَةُ اللّٰهِ وَبَرَكَاتُهُ، اَلسَّلَامُ عَلَيْنَا وَعَلَى عِبَادِ اللّٰهِ الصَّالِحِيْنَ، أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُوْلُهُ
समस्त अभिवादन अल्लाह के लिए हैं, इसी प्रकार सभी नमाज़ें और पवित्र कर्म भी। ऐ नबी! आप पर सलामती, अल्लाह की रहमत और उसकी बरकतें बरसें। हम पर और अल्लाह के नेक बंदों पर भी सलामती बरसे। मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य उपास्य नहीं है और मैं यह भी गवाही देता हूँ कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अल्लाह के बंदे और रसूल हैं।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 13
तशह्हुद के बाद नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दरूद पढ़ना
اَللّٰهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ، وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا صَلَّيتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ، وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيْمَ، إِنَّكَ حَمِيْدٌ مَجِيْدٌ، اَللّٰهُمَّ بَارِكْ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ، كَمَا بَارَكْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ، إِنَّكَ حَمِيْدٌ مَجِيْدٌ
हे अल्लाह! आप (अपने निकटवर्ती उच्च सदन में) मुहम्मद का सम्मान के साथ उल्लेख करें और उनके परिवार-परिजनों का भी, जैसे आपने इबराहीम और उनके परिवार-परिजनों का सम्मान के साथ उल्लेख किया। निश्चय ही आप अत्यंत प्रशंसित और परम महिमावान हैं। हे अल्लाह! आप मुहम्मद और उनके परिवार-परिजनों पर बरकत नाज़िल करें, जैसे आपने इबराहीम और उनके परिवार-परिजनों पर बरकत नाज़िल की थी। निश्चय ही आप अत्यंत प्रशंसित और परम महिमावान हैं।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 14
कब्र और जहन्नम की यातना तथा जीवन, मृत्यु और दज्जाल के फ़ितने से पनाह माँगने की दुआ
اَللّٰهُمَّ إِنِّيْ أَعُوْذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ، وَمِنْ عَذَابِ جَهَنَّمَ، وَمِنْ فِتْنَةِ الْمَحْيَا وَالْمَمَاتِ، وَمِنْ شَرِّ فِتْنَةِ الْمَسِيْحِ الدَّجَّالِ
ऐ अल्लाह! मैं आपसे क़ब्र के अज़ाब से, जहन्नम के अज़ाब से, जीवन और मृत्यु के फ़ितने से तथा मसीह दज्जाल के फ़ितने की बुराई से पनाह माँगता हूँ।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 15
सलाम से पहले अंतिम तशह्हुद के बाद की दुआ
اَللّٰهُمَّ إِنِّيْ ظَلَمْتُ نَفْسِيْ ظُلْمًا كَثِيرًا، وَلَا يَغْفِرُ الذُّنُوْبَ إِلَّا أَنْتَ، فَاغْفِرْ لِيْ مَغْفِرَةً مِّنْ عِنْدِكَ وَارْحَمْنِيْ، إِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُوْرُ الرَّحِيْمُ
ऐ अल्लाह! मैंने अपने ऊपर बहुत ज़ुल्म किया है। और आपके सिवा गुनाहों को कोई भी माफ़ नहीं कर सकता। अतः आप अपनी ओर से विशेष क्षमा द्वारा मुझे माफ़ कर दीजिए और मुझ पर दया कीजिए; निश्चय ही आप ही अत्यंत क्षमाशील, परम दयालु हैं।
संदर्भ: Hisnul Muslim
- 16
इस्तिखारा की नमाज़ की दुआ
اَللّٰهُمَّ إِنِّيْ أَسْتَخِيْرُكَ بِعِلْمِكَ، وَأَسْتَقْدِرُكَ بِقُدْرَتِكَ، وَأَسْأَلُكَ مِنْ فَضْلِكَ العَظِيْمِ. فَإِنَّكَ تَقْدِرُ وَلَا أَقْدِرُ، وَتَعْلَمُ وَلَا أَعْلَمُ، وَأَنْتَ عَلَّامُ الْغُيُوْبِ. اَللّٰهُمَّ إِنْ كُنْتَ تَعْلَمُ أَنَّ هٰذَا الْأَمْرَ (وَيُسَمِّي حَاجَتَهُ) خَيْرٌ لِيْ فِيْ دِيْنِيْ وَمَعَاشِيْ وَعَاقِبَةِ أَمْرِيْ، فَاقْدُرْهُ لِيْ وَيَسِّرْهُ لِيْ ثُمَّ بَارِكْ لِيْ فِيْهِ. وَإِنْ كُنْتَ تَعْلَمُ أَنَّ هٰذَا الْأَمْرَ شَرٌّ لِيْ فِيْ دِيْنِيْ وَمَعَاشِيْ وَعَاقِبَةِ أَمْرِيْ فَاصْرِفْهُ عَنِّيْ وَاصْرِفْنِيْ عَنْهُ وَاقْدُرْ لِيَ الْخَيْرَ حَيْثُ كَانَ، ثُمَّ أَرْضِنِيْ بِهِ.
ऐ अल्लाह! मैं आपके ज्ञान के माध्यम से आपसे भलाई चाहता हूँ। आपकी क़ुदरत के माध्यम से आपसे सामर्थ्य चाहता हूँ और आपके महान अनुग्रह की प्रार्थना करता हूँ। क्योंकि आप ही सामर्थ्यवान हैं, मैं सामर्थ्यहीन हूँ। आप ज्ञानवान हैं, मैं ज्ञानहीन हूँ और आप ग़ैब की बातों को भली-भाँति जानने वाले हैं। ऐ अल्लाह! यदि यह कार्य (यहाँ इच्छित कार्य या विषय का मन ही मन उल्लेख करे) आपके ज्ञान के अनुसार मेरे दीन, मेरी आजीविका और मेरे कार्य के परिणाम की दृष्टि से, (या फ़रमाया) मेरे लोक और परलोक के लिए कल्याणकारी हो, तो इसे मेरे लिए निर्धारित कर दें और इसे मेरे लिए आसान कर दें, फिर इसमें मेरे लिए बरकत प्रदान करें। और यदि यह कार्य आपके ज्ञान के अनुसार मेरे दीन, मेरी आजीविका और मेरे कार्य के परिणाम की दृष्टि से, (या फ़रमाया) मेरे लोक और परलोक के लिए हानिकारक हो, तो आप मुझे इससे दूर रखें और जहाँ कहीं भी भलाई हो, उस भलाई को मेरे लिए निर्धारित कर दें। तत्पश्चात मुझे उसी पर संतुष्ट रखें।
संदर्भ: Hisnul Muslim