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दुआएं

चिंता, मुसीबत, बीमारी और मृत्यु

8 दुआएं

  1. 1

    दुःख और चिंता के समय पढ़ी जाने वाली दुआ

    اللَّهُمَّ إِنِّي عَبْدُكَ، ابْنُ عَبْدِكَ، ابْنُ أَمَتِكَ، نَاصِيَتِي بِيَدِكَ، مَاضٍ فِيَّ حُكْمُكَ، عَدْلٌ فِيَّ قَضَاؤُكَ، أَسْأَلُكَ بِكُــــلِّ اسْمٍ هُوَ لَكَ، سَمَّيْتَ بِهِ نَفْسَكَ، أَوْ أَنْزَلْتَهُ فِي كِتَابِكَ، أَوْ عَلَّمْتَهُ أَحَداً مِنْ خَلْقِكَ، أَوِ اسْتَأْثَرْتَ بِهِ فِي عِلْمِ الغَيْبِ عِنْدَكَ، أَنْ تَجْعَلَ القُرْآنَ رَبِيعَ قَلْبِي، وَنُورَ صَدْرِي، وَجَلاَءَ حُزْنِي، وَذَهَابَ هَمِّي --- اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْهَمِّ وَالْحَزَنِ، وَالْعَجْزِ وَالْكَسَلِ، وَالْبُخْلِ وَالْجُبْنِ، وَضَلَعِ الدَّيْنِ وَغَلَبَةِ الرِّجَالِ

    हे अल्लाह! मैं आपका बंदा हूँ, आपके ही एक बंदे का पुत्र और आपकी एक बंदी का पुत्र हूँ। मेरा मस्तक (नियंत्रण) आपके हाथ में है; मुझ पर आपका आदेश लागू है; मेरे बारे में आपका फ़ैसला न्यायपूर्ण है। मैं आपसे आपके हर उस नाम के वसीले से प्रार्थना करता हूँ, जो आपने स्वयं अपने लिए रखा है, या जिसे आपने अपनी किताब में उतारा है, या अपनी सृष्टि में से किसी को सिखाया है, या अपने ग़ैबी ज्ञान में अपने लिए सुरक्षित रखा है—आप क़ुरआन को मेरे हृदय की शांति, मेरे सीने का प्रकाश, मेरे दुःख को दूर करने वाला और मेरी चिंता को मिटाने वाला बना दें। --- हे अल्लाह! निश्चय ही मैं चिंता और दुःख से, असमर्थता और आलस्य से, कंजूसी और कायरता से, ऋण के बोझ और लोगों के अत्याचार से आपकी शरण लेता हूँ।

    संदर्भ: Hisnul Muslim

  2. 2

    संकटग्रस्त व्यक्ति की दुआ

    (1) «لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ الْعَظِيمُ الْحَلِيمُ، لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ، لاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ رَبُّ السَّمَوَاتِ وَرَبُّ الْأَرْضِ وَرَبُّ الْعَرْشِ الْكَرِيمِ» (2) «اللَّهُمَّ رَحْمَتَكَ أَرْجُو، فَلاَ تَكِلْنِي إِلَى نَفْسِي طَرْفَةَ عَيْنٍ، وَأَصْلِحْ لِي شَأْنِي كُلَّهُ، لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ» (3) «لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظّالِمِينَ» (4) «اللَّهُ اللَّهُ رَبِّي لاَ أُشْرِكُ بِهِ شَيْئاً»

    (१) “अल्लाह के सिवा कोई हक़ इलाह नहीं, वह महान और सहनशील है। अल्लाह के सिवा कोई हक़ इलाह नहीं, वह महान अर्श का रब है। अल्लाह के सिवा कोई हक़ इलाह नहीं, वह आसमानों का रब, ज़मीन का रब और सम्मानित अर्श का रब है।” (२) “ऐ अल्लाह! मैं आपकी रहमत की ही आशा करता हूँ। अतः आप एक पल के लिए भी मुझे मेरे अपने हवाले न करें। आप मेरे समस्त मामलों को सुधार दें। आपके सिवा कोई हक़ इलाह नहीं।” (३) “आपके सिवा कोई हक़ इलाह नहीं, आप पवित्र एवं महान हैं, निश्चय ही मैं ज़ालिमों में से हूँ।” (४) “अल्लाह! अल्लाह! (वही) मेरा रब है! मैं उसके साथ किसी चीज़ को शरीक नहीं करता।”

    संदर्भ: Hisnul Muslim

  3. 3

    ईमान के बारे में संदेह में पड़े व्यक्ति की दुआ

    «آمَنْتُ بِاللَّهِ وَرُسُلِهِ» [1] « ﴿هُوَ الْأوَّلُ وَالْآخِرُ وَالظّاهِرُ وَالْباطِنُ وَهُوَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ﴾» [2]

    1. अल्लाह की शरण माँगेगा (‘आऊज़ु बिल्लाह’ कहेगा)। 2. जिस संदेह में पड़ा है, उसे दूर करेगा। 3. इसके बाद नंबर 1 की दुआ पढ़ेगा (अर्थ: मैं अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाया।) 4. इसके बाद नंबर 2 की दुआ (आयत) पढ़ेगा (अर्थ: वही सबसे पहले है, वही सबसे आख़िर है, वही सबके ऊपर है, वही सबके निकट है और वह हर चीज़ के बारे में सर्वज्ञ है।)

    संदर्भ: Hisnul Muslim

  4. 4

    कर्ज़ से मुक्ति के लिए दुआ

    (1) «اللَّهُمَّ اكْفِنِي بِحَلاَلِكَ عَنْ حَرَامِكَ، وَأَغْنِنِي بِفَضْلِكِ عَمَّنْ سِوَاكَ». (2) «اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْهَمِّ وَالْحَزَنِ، وَالْعَجْزِ وَالْكَسَلِ، وَالْبُخْلِ وَالْجُبْنِ، وَضَلَعِ الدَّيْنِ وَغَلَبَةِ الرِّجَالِ».

    (१) “हे अल्लाह! आप मुझे अपनी हलाल चीज़ों से संतुष्ट करके अपनी हराम चीज़ों से बचाए रखें और अपनी कृपा से मुझे अपने सिवा सभी से बेनियाज़ कर दें।” (२) “हे अल्लाह! निश्चय ही मैं चिंता और दुःख से, असमर्थता और आलस्य से, कंजूसी और कायरता से, क़र्ज़ के बोझ और लोगों के अत्याचार से आपकी शरण माँगता हूँ।”

    संदर्भ: Hisnul Muslim

  5. 5

    बच्चों के लिए शरण की प्रार्थना

    «أُعِيذُكُمَا بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّةِ مِنْ كُلِّ شَيْطَانٍ وَهَامَّةٍ، وَمِنْ كُلِّ عَيْنٍ لاَمَّةٍ».

    मैं तुम दोनों को अल्लाह के पूर्ण कलिमात की पनाह में देता हूँ, हर शैतान और विषैले जीव से तथा हर हानिकारक नज़र (बदनज़र) से।

    संदर्भ: Hisnul Muslim

  6. 6

    किसी मुसीबत में पड़े व्यक्ति की दुआ

    «إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ، اللَّهُمَّ أْجُرْنِي فِي مُصِيبَتِي، وَأَخْلِفْ لِي خَيْرَاً مِنْهَا»

    हम तो अल्लाह ही के हैं। और निश्चय ही हम उसी की ओर लौटने वाले हैं। ऐ अल्लाह! मुझे मेरी मुसीबत में सवाब प्रदान करें और मेरे लिए उसके बदले उससे भी बेहतर चीज़ अता करें।

    संदर्भ: Hisnul Muslim

  7. 7

    जनाज़े की नमाज़ की विभिन्न दुआएँ

    (1) «اللَّهُمَّ اغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ، وَعَافِهِ، وَاعْفُ عَنْهُ، وَأَكْرِمْ نُزُلَهُ، وَوَسِّعْ مُدْخَلَهُ، وَاغْسِلْهُ بِالْمَاءِ وَالثَّلْجِ وَالْبَرَدِ، وَنَقِّهِ مِنَ الْخَطَايَا كَمَا نَقَّيْتَ الثَّوْبَ الأَبْيَضَ مِنَ الدَّنَسِ، وَأَبْدِلْهُ دَاراً خَيْراً مِنْ دَارِهِ، وَأَهْلاً خَيْراً مِنْ أَهْلِهِ، وَزَوْجَاً خَيْراً مِنْ زَوْجِهِ، وَأَدْخِلْهُ الْجَنَّةَ، وَأَعِذْهُ مِنْ عَذَابِ القَبْرِ [وَعَذَابِ النَّارِ]» (2) «اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِحَيِّنَا وَمَيِّتِنَا، وَشَاهِدِنَا وَغَائِبِنَا، وَصَغِيرِنَا وَكَبيرِنَا، وَذَكَرِنَا وَأُنْثَانَا. اللَّهُمَّ مَنْ أَحْيَيْتَهُ مِنَّا فَأَحْيِهِ عَلَى الْإِسْلاَمِ، وَمَنْ تَوَفَّيْتَهُ مِنَّا فَتَوَفَّهُ عَلَى الإِيمَانِ، اللَّهُمَّ لاَ تَحْرِمْنَا أَجْرَهُ، وَلاَ تُضِلَّنَا بَعْدَهُ» (3) «اللَّهُمَّ إِنَّ فُلاَنَ بْنَ فُلاَنٍ فِي ذِمَّتِكَ، وَحَبْلِ جِوَارِكَ، فَقِهِ مِنْ فِتْنَةِ الْقَبْرِ، وَعَذَابِ النَّارِ، وَأَنْتَ أَهْلُ الْوَفَاءِ وَالْحَقِّ، فَاغْفِرْ لَهُ وَارْحَمْهُ إِنَّكَ أَنْتَ الغَفُورُ الرَّحيمُ» (4) «اللَّهُمَّ عَبْدُكَ وَابْنُ أَمَتِكَ احْتَاجَ إِلَى رَحْمَتِكَ، وَأَنْتَ غَنِيٌّ عَنْ عَذَابِهِ، إِنْ كَانَ مُحْسِناً فَزِدْ فِي حَسَنَاتِهِ، وَإِنْ كَانَ مُسِيئاً فَتَجَاوَزْ عَنْهُ»

    (१) “हे अल्लाह! आप उसे क्षमा करें, उस पर दया करें, उसे पूर्ण सुरक्षा प्रदान करें, उसे माफ़ कर दें, उसकी मेहमाननवाज़ी को सम्मानपूर्ण बनाएँ और उसके प्रवेश-स्थान अर्थात क़ब्र को विशाल कर दें। उसे पानी, बर्फ़ और ओलों से धो दें तथा उसे गुनाहों से इस प्रकार साफ़ कर दें, जैसे आपने सफ़ेद कपड़े को मैल से साफ़ किया है। उसे उसके घर के बदले बेहतर घर, उसके परिवार के बदले बेहतर परिवार और उसके जोड़े (पत्नी/पति) से बेहतर जोड़ा प्रदान करें। उसे जन्नत में दाख़िल करें और उसे क़ब्र के अज़ाब [और जहन्नम के अज़ाब] से बचाएँ।” (२) “हे अल्लाह! हमारे जीवितों और मृतकों, उपस्थित और अनुपस्थित लोगों, छोटे और बड़े तथा पुरुषों और स्त्रियों को क्षमा करें। हे अल्लाह! आप हममें से जिन्हें जीवित रखें, उन्हें इस्लाम पर जीवित रखें और जिन्हें मृत्यु दें, उन्हें ईमान के साथ मृत्यु दें। हे अल्लाह! हमें उसकी (मृत्यु पर धैर्य रखने के) सवाब से वंचित न करें और उसकी (मृत्यु के) बाद हमें पथभ्रष्ट न करें।” (३) “हे अल्लाह! अमुक का पुत्र अमुक आपकी ज़िम्मेदारी और आपकी पनाह की सुरक्षा में है; अतः आप उसे क़ब्र की परीक्षा और जहन्नम की यातना से बचाएँ। आप वचन पूरा करने वाले और वास्तविक सत्य के अधिकारी हैं। अतः आप उसे क्षमा करें और उस पर दया करें। निश्चय ही आप अत्यंत क्षमाशील, दयावान हैं।” (४) “हे अल्लाह! आपका एक दास और आपकी एक दासी का पुत्र आपके अनुग्रह का मोहताज है, जबकि आप उसे यातना देने से बेनियाज़ हैं। यदि वह नेक बंदा हो तो उसका सवाब और बढ़ा दें, और यदि वह बदकार बंदा हो तो उसके अपराधों से दरगुज़र करें।”

    संदर्भ: Hisnul Muslim

  8. 8

    नाबालिग बच्चों के लिए जनाज़े की नमाज़ में दुआ

    (1) «اللَّهُمَّ أَعِذْهُ مِنْ عَذَابِ القَبْرِ». «اللَّهُمَّ اجْعَلْهُ فَرَطاً وَذُخْراً لِوَالِدَيْهِ، وَشَفِيعاً مُجَاباً، اللَّهُمَّ ثَقِّلْ بِهِ مَوَازِينَهُمَا، وَأَعْظِمْ بِهِ أُجورَهُمَا، وَأَلْحِقْهُ بِصَالِحِ الْمُؤْمِنِينَ، وَاجْعَلْهُ فِي كَفَالَةِ إِبْرَاهِيمَ، وَقِهِ بِرَحْمَتِكَ عَذَابَ الْجَحِيمِ، وَأَبْدِلْهُ دَاراً خَيْراً مِنْ دَارِهِ، وَأَهْلاً خَيْراً مِنْ أَهْلِهِ، اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِأَسْلاَفِنَا، وَأَفْرَاطِنَا، وَمَنْ سَبَقَنَا بِالْإِيمَانِ» (2) «اللَّهُمَّ اجْعَلْهُ لَنَا فَرَطاً، وَسَلَفاً، وَأَجْراً».

    (१) “ऐ अल्लाह! इस बच्चे को क़ब्र के अज़ाब से बचाएँ।” “ऐ अल्लाह! इसे इसके माता-पिता के लिए आगे भेजा हुआ प्रतिनिधि अथवा सवाब और सुरक्षित रखे हुए सवाब के रूप में क़बूल करें। और इसे ऐसा शफ़ाअत करने वाला बनाएँ, जिसकी शफ़ाअत क़बूल की जाए। ऐ अल्लाह! इस बच्चे के द्वारा इसके माता-पिता के तराज़ुओं को और अधिक भारी कर दें। और इसके द्वारा उन दोनों का सवाब और बढ़ा दें। और इसे नेक लोगों का साथी बनाएँ तथा इसे इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ज़िम्मेदारी में रखें। और अपनी रहमत के वसीले से इसे जहन्नम के अज़ाब से बचाएँ। इसके इस निवास के बदले इसे उत्तम निवास प्रदान करें और यहाँ के परिवार के बदले उत्तम परिवार प्रदान करें। ऐ अल्लाह! हमसे पहले गुज़र चुके पुरुषों, स्त्रियों और आगे भेजी गई नाबालिग संतानों को माफ़ करें, और उन लोगों को भी जो ईमान के साथ हमसे पहले मृत्यु पा चुके हैं।” (२) “ऐ अल्लाह! हमारे लिए इसे आगे भेजा हुआ प्रतिनिधि, अग्रिम पुण्य और सवाब के रूप में निर्धारित कर दें।”

    संदर्भ: Hisnul Muslim