दुआ विशेष महत्त्व और प्रतिष्ठा वाला एक अमल है। अल्लाह के प्रति अपनी निर्भरता और विनय प्रकट करने का माध्यम दुआ है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दुआ को ही सर्वोच्च इबादत ठहराया है। आपने फ़रमाया,
«الدُّعَاءُ هُوَ الْعِبَادَةُ»
‘दुआ ही इबादत है।’[1] आपने यह भी फ़रमाया,
«لَيْسَ شَيْء أَكرَمَ عَلى الله سُبْحَانَه ِمنَ الدعَاء.»
‘अल्लाह के निकट दुआ से अधिक प्रिय कोई चीज़ नहीं है।’[2] अबू सईद ख़ुदरी रज़ि. से वर्णित है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,
«مَا مِنْ مُسْلِمٍ يَدْعُو، لَيْسَ بِإِثْمٍ وَلاَ بِقَطِيعَةِ رَحِمٍ ، إِلاَّ أَعْطَاهُ إِحْدَى ثَلاَثٍ : إِمَّا أَنْ يُعَجِّلَ لَهُ دَعْوَتَهُ، وَإِمَّا أَنْ يَدَّخِرَهَا لَهُ فِي الْآخِرَةِ ، وَإِمَّا أَنْ يَدْفَعَ عَنْهُ مِنَ السُّوءِ مِثْلَهَا ، قَالَ : إِذًا نُكْثِرُ ، قَالَ : اللَّهُ أَكْثَرُ».
‘जब कोई मुसलमान कोई दुआ करता है और उस दुआ में गुनाह की कोई बात नहीं होती तथा रिश्तेदारी का नाता तोड़ने की बात भी नहीं होती, तो अल्लाह उसे तीन चीज़ों में से एक अवश्य प्रदान करते हैं : या तो उसकी दुआ का फल उसे दुनिया में तत्काल दे देते हैं, अथवा उसे उसके लिए आख़िरत में संचित रखते हैं, या दुआ के बराबर गुनाह उससे दूर कर देते हैं।’ सहाबी ने कहा, तब तो हम बहुत अधिक दुआ करेंगे। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, अल्लाह भी बहुत अधिक देंगे।’[3]
हज में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का दुआ से गहरा संबंध था। आपने तवाफ़ के समय अपने रब से दुआ की।[4] सफ़ा और मरवा पर खड़े होकर दुआ की; अरफ़ा में ऊँट पर बैठकर हाथों को सीने तक उठाया और जिस तरह कोई मिस्कीन भोजन माँगता है, उसी तरह देर तक दुआ की और रोए; अरफ़ा में जहाँ आपने ठहराव किया था, वहाँ स्थिर रहकर सूर्य ढलने के बाद नमाज़ अदा करने से लेकर सूर्यास्त तक दुआ करते रहे। मुज़दलिफ़ा के मशअरुल हराम में फ़ज्र की नमाज़ के बाद आकाश उजला होने तक लंबे समय तक विनय और मुनाजात में लगे रहे।[5] तशरीक़ के दिनों में पहले दो जमरों पर कंकड़ मारने के बाद खड़े होकर हाथ उठाए और देर तक दुआ की।[6]
इब्नुल क़य्यिम रह. कहते हैं,
فَقَدْ تَضَمّنَتْ حَجّتُهُ صلى الله عليه وسلم سِتّ وَقَفَاتٍ لِلدّعَاءِ. الْمَوْقِفُ الْأَوّلُ عَلَى الصّفَا ، وَالثّانِي : عَلَى الْمَرْوَةِ ، وَالثّالِثُ بِعَرَفَةَ ، وَالرّابِعُ بِمُزْدَلِفَةَ ، وَالْخَامِسُ عِنْدَ الْجَمْرَةِ الْأُولَى ، وَالسّادِسُ عِنْدَ الْجَمْرَةِ الثّانِيَةِ
‘रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का हज छह स्थानों पर विशेष रूप से दुआ से परिपूर्ण था। पहला सफ़ा पर, दूसरा मरवा पर, तीसरा अरफ़ा में, चौथा मुज़दलिफ़ा में, पाँचवाँ पहले जमरे पर और छठा दूसरे जमरे पर।’[7]
यह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से वर्णित दुआओं का केवल आंशिक विवरण है। जबकि मदीना से प्रस्थान करने के समय से लेकर वहाँ वापस लौटने तक आप कभी भी अल्लाह की प्रशंसा और ज़िक्र से विरत नहीं रहे। इस दौरान आपकी ज़बान सदैव अल्लाह के ज़िक्र से तर रहती थी। आपने अल्लाह की महिमा के अनुरूप अत्यधिक प्रशंसा की। जैसे—तलबिया, तकबीर, तहलील, तस्बीह और अल्लाह की हम्द बयान करने में; कभी बैठकर, कभी खड़े होकर और कभी चलते हुए, अर्थात हर अवस्था में आप अल्लाह की प्रशंसा में लगे रहे। हज में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन करने पर यही बात हमारे सामने स्पष्ट रूप से प्रकट होगी।
उल्लेखनीय है कि हज में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दुआ और अपने रब की प्रशंसा का जितना वर्णन मिलता है, वह अवर्णित अंश की तुलना में अत्यंत थोड़ा है। क्योंकि दुआ बंदे और उसके रब के बीच का एक गुप्त रहस्य है। प्रत्येक व्यक्ति एकांत में अपने रब के सामने अपनी आवश्यकताओं के विषय में गहरी विनती और मुनाजात प्रस्तुत करता है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो अंश प्रकट किया, वह केवल उम्मत के लिए आदर्श स्थापित करने हेतु था, ताकि वे आपका अनुसरण कर सकें।
दुआ और ज़िक्र हज के उद्देश्यों और उसके बड़े मक़सदों में से हैं। निम्नलिखित आयत में इसी बात का संकेत मिलता है :
﴿فَإِذَا قَضَيۡتُم مَّنَٰسِكَكُمۡ فَٱذۡكُرُواْ ٱللَّهَ كَذِكۡرِكُمۡ ءَابَآءَكُمۡ أَوۡ أَشَدَّ ذِكۡرٗاۗ﴾ [البقرة: ٢٠٠]
‘फिर जब तुम अपने हज के कार्य पूरे कर लो, तो अल्लाह को याद करो, जैसे तुम अपने बाप-दादाओं को याद करते थे, बल्कि उससे भी अधिक याद करो।’[8]
अल्लाह तआला यह भी फ़रमाते हैं,
﴿ لِّيَشۡهَدُواْ مَنَٰفِعَ لَهُمۡ وَيَذۡكُرُواْ ٱسۡمَ ٱللَّهِ ﴾ [الحج: ٢٨]
‘ताकि वे अपने लिए लाभकारी विषयों से लाभान्वित हो सकें और अल्लाह के नाम का स्मरण कर सकें।’[9] इतना ही नहीं, बल्कि हज के सभी अमल अल्लाह के ज़िक्र के उद्देश्य से ही निर्धारित किए गए हैं। आयशा रज़ि. से वर्णित है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,
«إِنَّمَا جُعِلَ الطَّوَافُ بِالْبَيْتِ وَبَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ وَرَمْىُ الْجِمَارِ لإِقَامَةِ ذِكْرِ اللَّهِ».
‘बैतुल्लाह का तवाफ़, सफ़ा-मरवा की सई और कंकड़ मारना अल्लाह का ज़िक्र क़ायम करने के उद्देश्य से ही निर्धारित किए गए हैं।’[10]
इसलिए सफल वही व्यक्ति है जो इस विषय में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पदचिह्नों का अनुसरण करता है और बहुत अधिक दुआ, ज़िक्र तथा रोना-गिड़गिड़ाना करता है; अल्लाह के सामने अपनी निर्भरता प्रकट करता है; अपनी आवश्यकता प्रस्तुत करता है; अपने मौला के आगे झुकता है और स्वयं को तुच्छ बनाकर उपस्थित करता है। जागरूक हृदय और एकाग्र चित्त से व्यापक अर्थ वाली दुआओं के माध्यम से उनसे प्रार्थना करता है।
दुआ के आदाब :
दुआ के कई आदाब हैं, जिनका पालन करने पर दुआ क़बूल होने की आशा की जा सकती है। नीचे दुआ के कुछ आदाब उल्लेख किए जा रहे हैं : क़बूल क़बूल
१. पूरी निष्ठा के साथ अल्लाह तआला से दुआ करना। अल्लाह तआला फ़रमाते हैं,
﴿ ٱدۡعُونِيٓ أَسۡتَجِبۡ لَكُمۡۚ ﴾ [غافر: ٦٠]
‘तुम मुझसे दुआ करो, मैं तुम्हारी दुआ का उत्तर दूँगा।[11]
२. वुज़ू की अवस्था में दुआ करना। चूँकि दुआ एक इबादत है, इसलिए वुज़ू की अवस्था में करना ही उत्तम है।
हथेलियों को चेहरे की ओर करके दुआ करना। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,
«إِذَا سَأَلْتُمُ اللهَ فَاسْأَلُوهُ بِبُطُونِ أَكُفِّكُمْ وَلاَ تَسْأَلُوهُ بِظُهُورِهَا».
‘जब तुम अल्लाह से प्रार्थना करो, तो अपनी हथेलियों से प्रार्थना करो, हाथों की पीठ से नहीं।’[12] रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अमल के विषय में वर्णित है,
«كَانَ إِذَا دَعا جَعَلَ بَاطنَ كَفِّهِ إِلَى وَجْهِهِ».
‘रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दुआ करते समय अपनी हथेलियाँ अपने चेहरे की ओर रखते थे।’[13] आवश्यकता और विनय प्रकट करने का यही सर्वोत्तम तरीक़ा है, जिसमें कोई ज़रूरतमंद कुछ पाने की आशा में देने वाले की ओर विनम्र होकर हाथ फैलाता है।
३. हाथ उठाना। आवश्यकता पड़ने पर इतना ऊँचा उठाना कि बगलों के नीचे का भाग दिखाई देने लगे। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,
«مَا مِنْ عَبْدٍ يَرْفَعُ يَدَيْهِ يَسْأَلُ اللهَ مَسْأَلَةً إِلاَّ أتَاهَا إِيَّاهُ».
‘जो व्यक्ति अपने दोनों हाथ उठाकर अल्लाह से कोई चीज़ माँगता है, अल्लाह उसे वह चीज़ दे देते हैं।’[14]
४. अल्लाह तआला की प्रशंसा करना और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर सलात और सलाम पढ़ना।
फ़ुज़ाला इब्न उबैद रज़ि. से वर्णित है, उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमाज़ के दौरान एक व्यक्ति को इस प्रकार दुआ करते सुना कि उसने न अल्लाह तआला की प्रशंसा की और न रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर सलात और सलाम पढ़ा। तब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, ‘इस व्यक्ति ने जल्दबाज़ी की।’ इसके बाद आपने फ़रमाया,
«إِذَا صَلَّى أَحَدُكُمْ فَلْيَبْدَأْ بِتَحْمِيدِ رَبِّهِ جَلَّ وَعَزَّ وَالثَّنَاءِ عَلَيْهِ ثُمَّ يُصَلِّى عَلَى النَّبِىِّ صلى الله عليه وسلم ثُمَّ يَدْعُو بَعْدُ بِمَا شَاءَ»
‘जब तुममें से कोई दुआ करे, तो पहले अपने रब की प्रशंसा और स्तुति करे। फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर सलात और सलाम पढ़े। इसके बाद जो चाहे, माँगे।’[15] एक अन्य हदीस में आया है,
«كُلُّ دُعاءٍ مَحْجُوبٌ حَتَّى يُصَلَّى عَلَى النَّبِيِّ».
‘प्रत्येक दुआ नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर सलात पढ़े जाने तक रुकी रहती है।’[16]
अपने लिए और अपने प्रियजनों के लिए भलाई की दुआ करना तथा बुराई या अहित की दुआ न करना। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,
«لاَ يَزَالُ يُسْتَجَابُ لِلْعَبْدِ مَا لَمْ يَدْعُ بِإِثْمٍ أَوْ قَطِيعَةِ رَحِمٍ».
‘बंदे की दुआ क़बूल होती रहती है, जब तक वह किसी गुनाह या रिश्तेदारी का नाता तोड़ने की दुआ न करे।’[17] रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह भी फ़रमाया,
«لاَ تَدْعُوا عَلَى أَنْفُسِكُمْ وَلاَ تَدْعُوا عَلَى أَوْلاَدِكُمْ وَلاَ تَدْعُوا عَلَى أَمْوَالِكُمْ».
‘तुम अपने विरुद्ध, अपनी संतान के विरुद्ध और अपने धन के विरुद्ध बददुआ न करो।’[18]
५. दुआ क़बूल होने का दृढ़ विश्वास रखते हुए अल्लाह से दुआ करना।
«اُدْعُوا اللهَ وَأَنْتُمْ مُوقِنُونَ بِالإِجَابَةِ، وَاعْلَمُوا أَنَّ اللهَ لا يَسْتَجِيبُ دُعَاءً مِنْ قَلْبٍ غَافِلٍ لاهٍ».
‘क़बूल होने का दृढ़ विश्वास रखते हुए अल्लाह से दुआ करो। जान लो कि निश्चय ही अल्लाह ग़ाफ़िल और असावधान हृदय से निकली दुआ क़बूल नहीं करते।’[19]
दुआ में सीमा का उल्लंघन न करना। साद रज़ि. ने कहा, ऐ बेटे! मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फ़रमाते सुना है :
«سَيَكُونُ قَوْمٌ يَعْتَدُونَ فِى الدُّعَاءِ».
‘शीघ्र ही एक ऐसा समुदाय आएगा जो दुआ में सीमा का उल्लंघन करेगा।’[20]
और वह सीमा का उल्लंघन यह है कि ऐसी चीज़ माँगी जाए जिसका होना असंभव है। जैसे नबी या फ़रिश्ता बनने की दुआ करना। अथवा जन्नत का कोई निश्चित भाग प्राप्त करने की दुआ करना।
६. विनय और गिड़गिड़ाहट प्रकट करना। अल्लाह तआला फ़रमाते हैं,
﴿ وَٱذۡكُر رَّبَّكَ فِي نَفۡسِكَ تَضَرُّعٗا وَخِيفَةٗ وَدُونَ ٱلۡجَهۡرِ مِنَ ٱلۡقَوۡلِ بِٱلۡغُدُوِّ وَٱلۡأٓصَالِ ﴾ [الاعراف: ٢٠٥]
‘और सुबह-शाम अपने मन में विनय और भय के साथ तथा धीमी आवाज़ में अपने रब को याद करो।’[21]
७. व्यापक अर्थ वाले और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से वर्णित शब्दों और वाक्यों का प्रयोग करना। क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जिन शब्दों और वाक्यों का प्रयोग किया है, वे जामेअ अर्थात पूर्ण और व्यापक हैं। एक रिवायत में आया है,
كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَسْتَحِبُّ الْجَوَامِعَ مِنَ الدُّعَاءِ وَيَدَعُ مَا سِوَى ذَلِكَ.
‘रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम व्यापक अर्थ वाली दुआओं को पसंद करते और अन्य दुआओं को छोड़ देते थे।’[22]
८. अल्लाह तआला के सुंदर नामों और उनके महान गुणों का वसीला देकर दुआ करना। अल्लाह तआला फ़रमाते हैं,
﴿ وَلِلَّهِ ٱلۡأَسۡمَآءُ ٱلۡحُسۡنَىٰ فَٱدۡعُوهُ بِهَاۖ ﴾ [الاعراف: ١٨٠]
‘अल्लाह के सुंदर नाम हैं, अतः उनके माध्यम से उनसे दुआ करो।’[23]
९. ईमान और अमल-ए-सालेह अर्थात नेक कामों का वसीला देकर दुआ करना।
क. ईमान का वसीला देकर दुआ करने का उदाहरण क़ुरआनुल करीम में उल्लिखित है,
﴿ رَّبَّنَآ إِنَّنَا سَمِعۡنَا مُنَادِيٗا يُنَادِي لِلۡإِيمَٰنِ أَنۡ ءَامِنُواْ بِرَبِّكُمۡ فََٔامَنَّاۚ رَبَّنَا فَٱغۡفِرۡ لَنَا ذُنُوبَنَا وَكَفِّرۡ عَنَّا سَئَِّاتِنَا وَتَوَفَّنَا مَعَ ٱلۡأَبۡرَارِ ١٩٣ ﴾ [ال عمران: ١٩٣]
‘ऐ हमारे रब, निश्चय ही हमने एक पुकारने वाले को सुना, जो ईमान की ओर पुकार रहा था कि “अपने रब पर ईमान लाओ।” अतः हम ईमान ले आए। ऐ हमारे रब, हमारे गुनाहों को क्षमा कर दें, हमारी त्रुटियों को हमसे दूर कर दें और हमें नेक लोगों के साथ मृत्यु दें।’[24]
ख. अमल-ए-सालेह अर्थात नेक कामों का वसीला देकर दुआ करने का उदाहरण हदीस में उल्लिखित है,
‘तीन व्यक्तियों ने यात्रा के दौरान रात बिताने के लिए एक गुफा में शरण ली। अचानक पहाड़ से एक चट्टान गिरकर गुफा का मुँह बंद कर देती है। ऐसी असहाय अवस्था में उनमें से प्रत्येक ने अपने-अपने नेक अमल का वसीला देकर दुआ की। एक ने वृद्ध माता-पिता की सेवा, दूसरे ने अवैध यौनाचार से स्वयं को बचाने और तीसरे ने अमानत की उचित रक्षा का वसीला देकर चट्टान की इस बड़ी विपत्ति से मुक्ति के लिए अल्लाह से दुआ की। उनकी दुआ के फलस्वरूप चट्टान हट गई। वे सभी सुरक्षित रूप से गुफा से बाहर निकल आए।’[25]
१०. अपने गुनाहों को स्वीकार करके दुआ करना। उदाहरणस्वरूप, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया, ‘मछली के पेट में रहते हुए यूनुस अलैहिस सलाम ने जिस दुआ के माध्यम से अल्लाह तआला को पुकारा था (अर्थात لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظَّالِمِين ला इलाहा इल्ला अन्ता सुब्हानका इन्नी कुन्तु मिनज़ ज़ालिमीन। ‘आपके सिवा कोई इलाह नहीं। आप पवित्र और महान हैं। निश्चय ही मैं ज़ालिमों में से था।’), कोई भी मुसलमान व्यक्ति उसके द्वारा दुआ करे तो अल्लाह तआला उसकी दुआ क़बूल कर लेंगे।’[26]
११. ऊँची आवाज़ में दुआ न करना; धीमी आवाज़ में दुआ करना। अल्लाह तआला फ़रमाते हैं,
﴿ ٱدۡعُواْ رَبَّكُمۡ تَضَرُّعٗا وَخُفۡيَةًۚ إِنَّهُۥ لَا يُحِبُّ ٱلۡمُعۡتَدِينَ ٥٥ ﴾ [الاعراف: ٥٥]
‘अपने रब को विनयपूर्वक और चुपके से पुकारो। निश्चय ही वह सीमा का उल्लंघन करने वालों को पसंद नहीं करते।’[27] रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,
«يَا أَيُّهَا النَّاسُ ، ارْبَعُوا عَلَى أَنْفُسِكُمْ ، فَإِنَّكُمْ لاَ تَدْعُونَ أَصَمَّ وَلاَ غَائِبًا ، إِنَّهُ مَعَكُمْ ، إِنَّهُ سَمِيعٌ قَرِيبٌ».
‘ऐ लोगो, अपने ऊपर नरमी करो और धीमी आवाज़ में दुआ करो। क्योंकि तुम किसी बहरे या अनुपस्थित व्यक्ति को नहीं पुकार रहे हो। निश्चय ही वह अपने ज्ञान के साथ तुम्हारे साथ हैं। वह अत्यंत सुनने वाले और निकट हैं।’[28]
१२. अल्लाह से बार-बार माँगना। क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ऐसा ही करते थे। इब्न मसऊद रज़ि. कहते हैं,
كَانَ رسول الله صلى الله عليه وسلم يُعْجِبُهُ أَنْ يَدْعُوَ ثَلَاثًا، وَيَسْتَغْفِرَ ثَلَاثًا.
‘नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दुआ के वाक्यों को तीन-तीन बार कहना और तीन बार इस्तिग़फ़ार करना पसंद करते थे।’[29]
१३. क़िबला की ओर मुँह करके दुआ करना। अब्दुल्लाह इब्न मसऊद रज़ि. से वर्णित है, उन्होंने कहा,
اسْتَقْبَلَ النَّبِىُّ صلى الله عليه وسلم الْكَعْبَةَ فَدَعَا عَلَى نَفَرٍ مِنْ قُرَيْشٍ ، عَلَى شَيْبَةَ بْنِ رَبِيعَةَ ، وَعُتْبَةَ بْنِ رَبِيعَةَ وَالْوَلِيدِ بْنِ عُتْبَةَ ، وَأَبِى جَهْلِ بْنِ هِشَامٍ . فَأَشْهَدُ بِاللَّهِ لَقَدْ رَأَيْتُهُمْ صَرْعَى ، قَدْ غَيَّرَتْهُمُ الشَّمْسُ ، وَكَانَ يَوْمًا حَارًّا .
‘नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम काबा की ओर मुख किए। फिर क़ुरैश के कुछ लोगों के विरुद्ध बददुआ की। वे थे—शैबा इब्न रबीआ, उतबा इब्न रबीआ, वलीद इब्न उतबा और अबू जहल इब्न हिशाम। अल्लाह की क़सम, मैंने उन्हें मृत अवस्था में गिरे हुए देखा। धूप ने उनके शरीरों को बदल दिया था। उस समय गर्मी के दिन थे।’[30]
[1]. तिर्मिज़ी : २९६९।
[2]. सहीह इब्न हिब्बान : ८७०।
[3]. अल-अदबुल मुफ़रद : ७१०।
[4]. अबू दाऊद : १८९२।
[5]. मुस्लिम : १२१८।
[6]. बुख़ारी : १७५१।
[7]. ज़ादुल मआद : २/२६३।
[8]. बक़रा : २००।
[9]. हज : २८।
[10]. अबू दाऊद : १८९०।
[11]. ग़ाफ़िर : ६०।
[12]. अबू दाऊद : १४८६।
[13]. तबरानी : ११/१२२-३४।
[14]. तिर्मिज़ी : ३६०३।
[15]. अबू दाऊद : १४८३।
[16]. दैलमी : ३/४७९१; सहीहुल जामेअ : ४५२३।
[17]. मुस्लिम : ७११२।
[18]. मुस्लिम : ३००९।
[19]. तिर्मिज़ी : ३४७९।
[20]. अहमद : १/१७२।
[21]. आराफ़ : २०५।
[22]. अबू दाऊद : १४८२।
[23]. आराफ़ : १८०।
[24]. आले-इमरान : १९३।
[25]. बुख़ारी : २१११।
[26]. तिर्मिज़ी : ५०५३; मुस्तदरक हाकिम : ४४४३।
[27]. आराफ़ : ५५।
[28]. बुख़ारी : ९२२९; मुस्लिम : २७०४।
[29]. मुसनद अहमद : १/३९४।
[30]. बुख़ारी : ३९६०; मुस्लिम : १७९४।