‘मबरूर’ का अर्थ ‘मक़बूल’ है। मबरूर हज का अर्थ मक़बूल हज है। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,
«وَالْحَجُّ الْمَبْرُورُ لَيْسَ لَهُ جَزَاءٌ إِلاَّ الْجَنَّةُ».
‘और मबरूर हज का प्रतिदान जन्नत के सिवा कुछ नहीं है।’[1] इसलिए हमारे हज के मबरूर या मक़बूल होने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए।
हलाल कमाई
हज की यात्रा दुआ क़बूल होने की यात्रा है। फिर भी यदि इसे हराम माल से किया जाए, तो इसके क़बूल न होने की बात सामने आ ही जाती है। हदीस में आया है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,
«أَيُّهَا النَّاسُ، إِنَّ اللهَ طَيِّبٌ لَا يَقْبَلُ إِلَّا طَيِّبًا، وَإِنَّ اللهَ أَمَرَ الْمُؤْمِنِينَ بِمَا أَمَرَ بِهِ الْمُرْسَلِينَ، فَقَالَ: (يَا أَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًا، إِنِّي بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ) [المؤمنون: 51] وَقَالَ: (يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ) [البقرة: 172] ثُمَّ ذَكَرَ الرَّجُلَ يُطِيلُ السَّفَرَ أَشْعَثَ أَغْبَرَ، يَمُدُّ يَدَيْهِ إِلَى السَّمَاءِ، يَا رَبِّ، يَا رَبِّ، وَمَطْعَمُهُ حَرَامٌ، وَمَشْرَبُهُ حَرَامٌ، وَمَلْبَسُهُ حَرَامٌ، وَغُذِيَ بِالْحَرَامِ، فَأَنَّى يُسْتَجَابُ لِذَلِكَ؟»
‘ऐ लोगो, निःसंदेह अल्लाह पवित्र है और वह पवित्र वस्तु के सिवा कुछ स्वीकार नहीं करता। और अल्लाह ने मोमिनों को उसी काम का आदेश दिया है, जिसका आदेश उसने पैग़म्बरों को दिया है। अतः महान अल्लाह ने फ़रमाया, ‘ऐ रसूलो! तुम पवित्र वस्तुओं में से खाओ और नेक काम करो।’ (सूरा मुमिनून, आयत 51) उसने यह भी फ़रमाया, ‘ऐ ईमान वालो! हमने तुम्हें जो रिज़्क़ दिया है, उसमें से पवित्र वस्तुएँ खाओ और अल्लाह का शुक्र अदा करो, यदि तुम केवल उसी की इबादत करते हो।’ (सूरा बक़राह, आयत 172)
फिर आपने उस व्यक्ति का उल्लेख करते हुए फ़रमाया, जो बिखरे बालों और धूल से सने पैरों के साथ लंबी यात्रा में रहते हुए आसमान की ओर दोनों हाथ उठाकर ‘या रब्ब! या रब्ब!’ कहकर दुआ करता है। जबकि उसका भोजन हराम है, उसका पेय हराम है, उसका पहनावा हराम है और उसके शरीर का पोषण भी हराम वस्तुओं से हुआ है। फिर उसकी दुआ कैसे क़बूल की जाएगी?’’ ’[2]
दिखावे और नाम कमाने की मानसिकता का त्याग
अनस इब्न मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, उन्होंने कहा, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,
«اَللّهُمَّ حَجَّةً لاَ رِيَاءَ فِيْهَا وَلاَ سُمْعَةَ».
‘ऐ अल्लाह, ऐसे हज की तौफ़ीक़ प्रदान कर, जो दिखावे और नाम कमाने की मानसिकता से मुक्त हो।’[3]
भोजन कराना और अच्छी बात कहना
जाबिर इब्न अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, उन्होंने कहा, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा गया कि कौन-सा काम हज को मबरूर बनाता है? आपने फ़रमाया,
«إِطْعَامُ الطَّعَامِ وَطِيبُ الْكَلاَمِ».
‘भोजन कराना और अच्छी एवं सुंदर बात कहना।’[4] ख़ल्लाद इब्न अब्दुर्रहमान से वर्णित है, उन्होंने कहा, मैंने सईद इब्न जुबैर से पूछा, कौन-सा हाजी सबसे उत्तम है? उन्होंने कहा, जो भोजन कराता है और अपनी ज़बान पर नियंत्रण रखता है। उन्होंने कहा, मुझसे सौरी ने कहा, हमने सुना है कि यही मबरूर हज है।’[5]
सलाम का आदान-प्रदान
जाबिर इब्न अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, उन्होंने कहा, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा गया कि किस काम से हज मबरूर होता है? आपने फ़रमाया,
«إِطْعَامُ الطَّعَامِ، وَإِفْشَاءُ السَّلَامِ».
‘भोजन कराने और अधिक से अधिक सलाम का आदान-प्रदान करने से।’[6]
तलबिया पढ़ना और क़ुर्बानी करना
अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा गया कि हज में किस काम का सवाब अधिक है? आपने फ़रमाया, الْعَجُّ وَالثَّجُّ ‘ऊँची आवाज़ में तलबिया पढ़ना और जानवर का ख़ून बहाना।’[7]
अच्छा पड़ोसी-सुलभ व्यवहार करना
अब्दुल्लाह इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, उन्होंने कहा, ‘हज में सबसे अधिक पुण्य वाला काम भोजन कराना और अच्छा पड़ोसी-सुलभ व्यवहार करना है।’[8]
सब्र, तक़वा और सद्व्यवहार
सौर इब्न यज़ीद से वर्णित है, उन्होंने कहा, ‘जो इस काबा घर का इरादा करे, जबकि उसमें तीन विशेषताएँ न हों, उसका हज सुरक्षित नहीं है: सब्र, जिससे वह अपनी अज्ञानता को नियंत्रित करे; तक़वा, जो उसे अल्लाह के निषिद्ध कार्यों से रोके; और साथियों के साथ सद्व्यवहार।’[9]
दुनिया के प्रति विरक्ति और आख़िरत के प्रति रुचि
एक व्यक्ति ने हसन बसरी से कहा, ऐ अबू सईद, मबरूर हज कौन-सा है? उन्होंने कहा, ‘वह हज जो दुनिया के प्रति विरक्त और आख़िरत के प्रति उत्सुक बना दे।’[10]
हज से पहले की अवस्था की तुलना में बाद की अवस्था में सुधार
जब कोई हाजी हज की यात्रा पर निकलेगा, पवित्र भूमि पर क़दम रखेगा, फिर हज पूरा करके अपने देश लौटेगा, तब हम उसे देखकर समझ सकेंगे कि उसकी अवस्था में सुधार हुआ है या नहीं। यदि दूसरों के साथ उसके आचार-व्यवहार, लेन-देन, अमानतदारी, दूसरों के अधिकार अदा करने और इबादत पर दृढ़ रहने में सुधार हुआ है, तो समझना चाहिए कि उसका हज मबरूर हुआ है।’
संक्षेप में, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मबरूर हज की विभिन्न व्याख्याएँ वर्णित हुई हैं। इसका कारण यह है कि मबरूर हज दो तरीक़ों से होता है। एक, लोगों के साथ सद्व्यवहार। दो, हज के विधि-विधानों का पूर्ण रूप से पालन।
लोगों के साथ सद्व्यवहार का विषय व्यापक है। इसकी व्यापकता को स्पष्ट करते हुए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया,
«أَنْ تُعِيْنَ الرَّجُلُ عَلَى دَابَّتِهِ، تَحْمِلُهُ عَلَيْهَا وَتَدُلُّهُ عَلَى الطَّرِيْقِ، كُلُّ ذَلِكَ صَدَقَةٌ»
‘तुम किसी व्यक्ति को उसकी सवारी पर चढ़ने में सहायता करो, उसे उस पर चढ़ा दो और रास्ता दिखा दो—ये सभी सदक़ा हैं।’[11] इब्न उमर रज़ियल्लाहु अन्हु कहा करते थे,
«البرُّ شيءٌ هيِّنٌ : وجهٌ طليقٌ وكلامٌ ليِّنٌ.
‘नेक काम बहुत आसान है: मुस्कुराता चेहरा और कोमल वचन।’[12]
चूँकि हज के मौसम में दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों से अलग-अलग स्वभाव और भिन्न परिवेश के लोग एकत्र होते हैं, इसलिए क़ुरआनुल करीम में अल्लाह तआला ने इन विविधताओं और दूरियों को मिटाकर, हर प्रकार के विवाद और झगड़े से बचते हुए, आपसी भाईचारे और सौहार्द की भावना में एकाकार होने की शिक्षा दी है। अल्लाह तआला फ़रमाता है,
﴿ ٱلۡحَجُّ أَشۡهُرٞ مَّعۡلُومَٰتٞۚ فَمَن فَرَضَ فِيهِنَّ ٱلۡحَجَّ فَلَا رَفَثَ وَلَا فُسُوقَ وَلَا جِدَالَ فِي ٱلۡحَجِّۗ ﴾ [البقرة: ١٩٧]
‘हज के महीने निश्चित हैं। अतः जो इन महीनों में अपने ऊपर हज अनिवार्य कर ले, उसके लिए हज में अश्लीलता, पाप और झगड़ा-विवाद वैध नहीं है।’[13]
सारांश यह है कि वही मबरूर हज है, जिसमें भलाई का पूर्ण समावेश हो। जिसमें हज के सभी रुक्न, वाजिब, सुन्नत और मुस्तहब पूर्ण रूप से अदा किए जाएँ। इसके अतिरिक्त उसमें हर प्रकार के गुनाह और पापाचार से बचा जाए। वास्तव में जो व्यक्ति सभी वाजिब, सुन्नत और मुस्तहब सहित हज को पूरी तरह अदा करेगा, वह निश्चित रूप से इस पुण्यमयी यात्रा में पापाचार से बचा रहेगा।’
और चूँकि केवल जन्नत ही मबरूर हज का प्रतिदान है, इसलिए जो व्यक्ति इस यात्रा पर निकलकर इसके सभी विधि-विधानों का भली-भाँति पालन करते हुए हज पूरा करता है, वह वास्तव में जन्नत लेकर ही लौटता है। मृत्यु के बाद जन्नत ही उसका ठिकाना है। अतः जिस सौभाग्यशाली व्यक्ति को अल्लाह तआला इस नेमत और अनुग्रह से विभूषित करता है, उसके लिए किसी भी तरह उचित नहीं कि वह लापरवाही से इस नेमत को हाथ से जाने दे; हज की शिक्षाओं के विरुद्ध कार्यों द्वारा स्वयं को इस महान पुरस्कार से वंचित करे; बल्कि उसे चाहिए कि हर क़ीमत पर इस नेमत को सुरक्षित रखे।
हर मुसलमान को जानना चाहिए कि हज के लिए मक्का जाना अल्लाह की एक विशेष देन और अनुग्रह है। कोई व्यक्ति अपने धन, शारीरिक शक्ति, अपनी क्षमता या पद के बल पर वहाँ नहीं जा सकता। इसी कारण तफ़सीरकारों ने कहा है कि जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने इसकी पहली नींव रखी और काबा घर का निर्माण किया, तब अल्लाह तआला ने उनकी ओर वह्य भेजी, ‘ऐ इब्राहीम, तुम मानवजाति को काबा आने का आह्वान करो।’ उन्होंने कहा, ऐ मेरे रब, मेरी आवाज़ कितनी दूर तक पहुँचेगी? उन सब तक मेरा आह्वान कैसे पहुँचेगा? अल्लाह तआला ने फ़रमाया, तुम्हारा दायित्व आह्वान करना है और मेरा दायित्व उसे पहुँचा देना है। इसके बाद इब्राहीम अलैहिस्सलाम मक़ामे इब्राहीम पर खड़े होकर ऊँची आवाज़ में पुकारते हैं, ‘ऐ मानव समुदाय, अल्लाह ने तुम्हारे लिए एक घर बनाया है, अतः तुम इसकी ओर आओ।’ इस पुकार पर भविष्य में हज करने वाले सभी लोगों ने लब्बैक कहा। यहाँ तक कि क़ियामत तक आने वाले सभी लोगों ने अपने बाप-दादाओं की पीठ से इसका उत्तर दिया। जिसने एक बार लब्बैक कहा, वह एक बार हज करेगा। जिसने दो बार लब्बैक कहा, वह दो बार हज करेगा। जिसने जितनी बार कहा, उसके नसीब में उतनी बार हज होगा।[14]
इसीलिए जब हाजी साहब हज के कार्यों का आरंभ करते हैं, तब उनका उद्घोष होता है, ‘लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक’। शब्दकोश की दृष्टि से लब्बैक का अर्थ आह्वान का उत्तर देना और जवाब देना है। जब कोई किसी को पुकारे और वह उत्तर में लब्बैक कहे, तो इसका अर्थ होता है, मैं यहाँ उपस्थित हूँ। मैं आपके आदेश का पालन करने के लिए तैयार हूँ। मैं आपकी पुकार का उत्तर दे रहा हूँ, इत्यादि। अतः जब हाजी साहब लब्बैक कहकर हज के कार्यों का आरंभ करते हैं, तब वह वास्तव में इब्राहीम अलैहिस्सलाम की उसी पुकार का उत्तर देते हैं।
संक्षेप में, हज पर जा पाना केवल अल्लाह तआला का अनुग्रह है। प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि उसके अपने समुदाय के बहुत-से लोगों को यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ, जबकि वे धन, जनबल, शक्ति और पद में उससे कहीं बड़े हैं। यदि उस पर अल्लाह की दया न होती, तो वह हज नहीं कर सकता था। यदि किसी को इस सौभाग्य से विभूषित किया जाए, तो समझना चाहिए कि यह केवल अल्लाह की दया है। सुब्हानल्लाह! ‘जन्नत ही मबरूर हज का प्रतिदान है!’
[1]. बुख़ारी: 3771; मुस्लिम: 9431।
[2]. मुस्लिम: 1015।
[3]. सुनन इब्न माजाह: 2890।
[4]. मुस्तदरक: 1/1778।
[5]. मुसन्नफ़ अब्दुर-रज़्ज़ाक: 5/8816।
[6]. मुस्नद अहमद: 3/325, 334।
[7]. सुनन तिर्मिज़ी: 3/189।
[8]. अल-इस्तिज़कार: 4/104।
[9]. अल-इस्तिज़कार: 4/104।
[10]. अल-इस्तिज़कार: 4/104।
[11]. इब्न ख़ुज़ैमा: 1493।
[12]. इब्न रजब, जामिउल उलूम वल-हिकम: 39/8।
[13]. बक़राह: 187।
[14]. नसबुर-राया: 3/23।