रमल की शुरुआत सातवीं हिजरी में हुई। रसूलुल्लाह (ﷺ) छठी हिजरी में हुदैबिया से उमरा किए बिना ही लौट गए थे। हुदैबिया की संधि के अनुसार अगले वर्ष वह उमरा करने के उद्देश्य से वापस आए। वह ज़िलक़दा का महीना था। इस वर्ष कुछ सहाबा बुखार से पीड़ित थे। इसलिए मक्का के मुशरिक मुसलमानों का उपहास करते हुए आपस में कहने लगे, ‘तुम्हारे पास एक ऐसा समुदाय आ रहा है, जिसे यसरिब (मदीना) के बुखार ने कमज़ोर कर दिया है।’[1] यह सुनकर रसूलुल्लाह (ﷺ) ने सहाबा (रज़ि.) को रमल करने, अर्थात हमारे युग की सैन्य टुकड़ियों के ढंग से छोटे-छोटे क़दमों के साथ शरीर को झुकाकर और सीना तानकर दौड़ने का आदेश दिया। उद्देश्य यह था कि मुशरिकों को समझा दिया जाए कि मोमिन कभी कमज़ोर नहीं होता। इसी उद्देश्य से रमल के साथ-साथ उन्होंने इज़्तिबा, अर्थात चादर को दाहिनी बगल के नीचे रखकर दाहिना कंधा खुला रखने का भी निर्देश दिया। तभी से रमल और इज़्तिबा का विधान प्रचलित हुआ।
[1] - عن ابن عباس رضي الله عنهما قال :قدم رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه ، فقال المشركون : إنه يقدم عليكم قوم قد وهنتهم حمى يثرب ، فأمرهم النبي صلى الله عليه وسلم أن يرمـلوا في الأشواط الثلاثة .. وفــــــــــــي رواية زيادة : ارملوا ليرى المشركون قوتكم بخاري : 1602 ومسلم : 1262.